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SipSci Vocal Episode 5 Transcrit

Hindi Transcript

Hello and Welcome to SipSci Vocal… कभी Global, कभी Local… मैं हूं इस शो की होस्ट नेहा त्रिपाठी… और आज मैं आपके लिए ये लेकर आई हूं… 

Various Audio 

(कुकर की सीटी, दाल की छौंक और मसाला पीसने की आवाज़

ये सारी आवाज़ें मेरे किचन से आ रही हैं… एक तरफ दाल पक रही है… कुकर की सीटी बज रही है… तो दूसरी तरफ सब्ज़ी छौंकी है… और मिक्सी में चटनी पीसी जा रही है… यानी dinner लगभग तैयार है… 

अब सवाल ये है कि आज मैंने ये डिनर क्यों बनाया… 

क्योंकि मुझे ये podcast तैयार करना था, समय कम था, काम ज़्यादा… तो मैंने ये menu चुना… वैसे समय कम हो, काम ज़्यादा हो, तो हम बाहर से भी खाना मंगवा सकते हैं… लेकिन आज मेरा बाहर से खाना खाने का मूड ही नहीं हुआ… ऐसा क्यों? आइए इसी मूड और फ़ूड के कनेक्शन को समझते हैं… 

मूड कई तरह के होते हैं… जैसे खुशी, दुख, उदासी, डर, गुस्सा… वगैरह-वगैरह… ख़ुशी में तो हम जानते हैं कि हम पार्टी mode on कर लेते हैं और पार्टी का menu तो लगभग तय ही होता है… लेकिन जब दुखी या उदास होते हैं तब ? कौन सा खाना खाने से मूड एकदम bright sunny day जैसा होता है… और किस तरह का खाना खाने से मूड dull and boring हो जाता है ? जब ग़ुस्सा आता है तो हम किस तरह का खाना खाते हैं या फिर कौन सा खाना ख़ाने से ग़ुस्सा आता है ? इस सब के बारे में आज जानेंगे… 

Music Break 

तो मैंने अपनी फोनबुक खंगालनी शुरु की… जानी-मानी nutritionist डॉ नीलांजना सिंह जी को call किया और उनसे बात की…

नेहा त्रिपाठी – Hello Dr. Neelanjana… Thank you so much for taking out time for us… 

डॉ नीलांजना सिंह – Glad to be here Neha ji… Thank you for inviting me… 

नेहा त्रिपाठी – आज जो हम बात कर रहे हैं कि खाने का मूड से क्या कनेक्शन होता है ? तो मैं आपसे सीधा सवाल करती हूँ कि अगर इस समय मेरा मन कर रहा है बहुत सारी कचौड़ियाँ, जलेबी, समोसे, पकौड़े या इस तरह कि चटपटी चीज़ें खाने का… तो असल में मेरा मूड कैसा है ? 

डॉ नीलांजना सिंह – दिलचस्प सवाल है नेहा जी… सबसे पहले तो ये बताना चाहूँगी कि समोसा, कचौड़ी खाने का मन कभी-कभी करना perfectly normal है… ये abnormal body physiology नहीं है… लेकिन अगर आपको सारा समय इसी तरह का खाना खाने का मन हो रहा है… और बाकी खाना जैसे सब्ज़ियां, फल, दालें खाने का मन नहीं कर रहा है… तो इसको examine करना होगा कि क्या आप depression में हैं… क्या आपका मूड low है किसी भी वजह से… क्या आपकी नींद पूरी नहीं हो रही है… क्या आपकी diet में fibre की कमी है… इन बातों की वजह से आपको तला-भुना चटपटा खाने का मन कर सकता है… अगर आपको रोज़ ऐसा खाने का मन कर रहा है तो… 

नेहा त्रिपाठी – और अगर कभी-कभी ऐसा हो रहा है तो ? इसका क्या मतलब है ? 

डॉ नीलांजना सिंह – जब हम celebrate करते हैं तो हम हटके खाना खाते हैं… तो वो normal है… 

नेहा त्रिपाठी – इसी तरह जैसे दलिया, ओट्स या अंकुरित भोजन होता है… या फल-सब्जियां जैसा आपने अभी ज़िक्र किया… इसे सेहतमंद खाना माना जाता है… लेकिन कुछ लोग इसे बीमारों वाला खाना कहते हैं… इसे कैसे देखती हैं आप… क्या ये बीमारों वाला खाना है? 

डॉ नीलांजना सिंह – ये सवाल भी दिलचस्प है… हमारे culture में चीज़ें चली आ जाती हैं न वो deeply engrave हो जाती हैं… बहुत सारे asian culture में Buddha bowl या One dish meal जिसे हम खिचड़ी कहते हैं… वो बहुत ही appetizing खाना होता है… बहुत चाव से खाते हैं… लेकिन हमारे यहां ये लगता है कि खिचड़ी सिर्फ बीमारी में ही खाते हैं… normal diet में खिचड़ी नहीं खा सकते हैं… तो ये जैसे हम मार्केट कर रहे हैं खाने को… जैसे हम अपने culture में इसको ले आते हैं उससे बहुत कनेक्शन है… और अब जब हमारा exposure different cultures से है तो हम खिचड़ी को भी Risotto बनाकर खाते हैं… और बच्चों को अगर interesting नाम बताइए तो वो खिचड़ी भी खुशी-खुशी खा लेते हैं… लेकिन अगर खिचड़ी कहेंगे तो ये बीमारों वाला खाना है… 

Music Break 

मूड का तो क्या है न कि, किसी भी बात से ख़राब हो सकता है… जैसे आपको पोहा पसंद है और आपने पूरे उत्साह और ख़ुशी के साथ पोहा बनाया और खाने बैठे तो पता चला कि नमक ज़्यादा हो गया है… अब अगली बार जब आप पोहा बनाएँगे तो आपका पसंदीदा भोजन होने के बावजूद ख़ुशी से ज़्यादा टेंशन होगी कि इस बार ठीक बन जाए… ऐसे में confusion ये है कि ज़्यादा नमक वाले पोहे ने मूड खराब किया या मूड खराब था इसलिए पोहे में नमक ज़्यादा हो गया? 

इस बातचीत में जोड़ते हैं Dr. Sylvia Fernandez Rao को, जो National Institute of Nutrition में psychologist हैं… उन्होंने nutrition and behaviour पर काफी काम किया है… 


नेहा त्रिपाठी – Hi Dr. Sylvia, Good to have you on the show. 

डॉ सिल्विया – Hi Neha, Thank you for having me… It’s a pleasure… 

नेहा त्रिपाठी – डॉ सिल्विया, being a psychologist, इस शो में हम आपसे ये समझना चाहते हैं कि मूड कैसा है हमारा इससे हमारे food choices पर फर्क पड़ता है? हम उस हिसाब से अपना खाना, दिनभर का menu तय करते हैं ? या फिर जो खाना हम चुनते हैं उससे हमारे मूड पर फ़र्क़ पड़ता है ? हमारा मूड अच्छा, ख़राब, low, high होता है… क्या रिश्ता है ? 

डॉ सिल्विया – आप ही सोचिए कि अगर सुबह नाश्ता नहीं मिला… तो आपका मूड कैसा होगा ? चिड़चिड़ा… बच्चे को समय से दूध नहीं मिला तो बच्चा क्या करेगा ? रोएगा… तो खाना नहीं मिलने से आपका मूड ख़राब होता है… ऐसे में जब आप खाना चुनेंगे तो आपको जो कमी है… उतना आपको वो खाना खाने का मन करेगा… आपके sugar level कम हो जाएंगे तो अगर आप बहुत देर तक भूखे रहने के बाद खाना खाएंगे तो आप बहुत सारा carbohydrates खाना पसंद करेंगे जिससे आपके शरीर में balance हो जाएगा। तो जब आपका cycle disturb होता है तो उसके हिसाब से आप खाना चुनेंगे। दूसरा पहलू ये भी है कि जब हम low feel कर रहे हैं… depressed feel कर रहे हैं… तो ऐसे feel good food होते हैं जो rich in fats and sugar हैं… ऐसा खाना पसंद आता है… They have a sense of elevating your body… इससे हमारे जो neurotransmitters होते हैं… dopamine level high होते हैं… इस तरह के खाने की तरफ हम आकर्षित होते हैं… 

नेहा त्रिपाठी – आपने अभी dopamine का ज़िक्र किया, तो dopamine को हमारे दिमाग़ का reward centre भी कहा जाता है… हम कुछ अच्छा खा रहे हैं तो dopamine release होता है… हमें खुशी होती है, हमें अच्छा लगता है…  हमें कुछ तला-भुना खा रहे हैं तो हमें बहुत मज़ा आता है… We feel like we are rewarding ourselves… तो इस तरह के खाने को अगर हम कम करें क्योंकि हम जानते हैं कि ये ठीक नहीं है… हमें रोज़-रोज़ ऐसा नहीं खाना चाहिए… अगर हम ये नहीं खाते हैं तो ये जो dopamine hormone जो है वो कम secrete होगा… तो इसके बाद कौन सा hormone secrete होता जिससे हमें balance करने में मदद मिल सके ? 

डॉ सिल्विया – ये सिर्फ़ खाने में नहीं है, ये जब आप कुछ अच्छा करते हैं… कुछ achieve करते हैं जो आपने बहुत मेहनत के बाद पाया है… promotion मिला है… किसी से प्यार हो गया है… या अच्छा खाना खाया है… तो इन सब स्थितियों में same mechanism work करता है… तो अभी आप ही सोचिए कि अगर आपको किसी ने कुछ बढ़ा-चढ़ा कर बोला है… कि ये ऐसा है, स्वाद बहुत अच्छा है… तो आप एक expectation के साथ खाने बैठते हैं… और वो स्वाद expectation से बढ़कर होना चाहिए… अगर आपको वो feeling आनी है तो… जैसे कोई movie review भी अगर किसी ने बढ़ा-चढ़ा कर बोला और आपने जाकर देखा… it may not meet your expectations… बिल्कुल वैसे ही अभी आप इतना खाए…  तो next level तक high होने के लिए you will have to eat more often… तभी वो level of satisfaction मिलेगा… इसी तरह वो cycle keeps going on और आप loop में आ जाते हैं…

नेहा त्रिपाठी – Depression हो गया या stress होता है… ऐसे में कुछ लोग जो हैं वो बहुत ज़्यादा खाने लगते हैं जबकि कुछ लोग बिल्कुल खाना बंद कर देते हैं… तो ऐसे में depression में किस तरह का खाना खाना चाहिए कि आपका जो मूड हो वो ठीक हो… बेहतर हो… 

डॉ सिल्विया – ये जो आपने बोला कि stress में कम और ज़्यादा खाते हैं, ये बिल्कुल सही है… When it is uncontrollable, high and personal stress इस समय खाना खाया नहीं जाता है, appetite suppress हो जाता है… और जो psychosocial है, जो आपका society या दूसरों के साथ interaction है, जो comparison या relationship से आता है, तो you tend to eat more… वहां से comfort eating या stress eating आता है… अब जो आपने पूछा कि Depression में कैसा खाना खाना चाहिए… तो आपको balanced diet पर ध्यान रखना चाहिए… आपकी आधी से ज़्यादा प्लेट में फल और सब्ज़ियां होनी चाहिए… और एक चौथाई carbohydrates होना चाहिए… इनक sugar release तेज़ नहीं होता है… धीरे-धीरे होता है… That way all your other mechanisms fall in place… इसके अलावा nuts, protein, राजमा, छोले, लोबिया वगैरह… इससे सिर्फ depression related नहीं, health related फायदे हैं… 

नेहा त्रिपाठी – यहाँ पर ये भी बताइए कि जैसे कुछ लोगों को ग़ुस्सा बहुत ज़्यादा आता है, तो क्या किसी तरह का ख़ाना होता है जो ग़ुस्सा control करने में मदद करे ? या कोई ऐसा खाना होता है जो बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा दिलाता है… तो उस समय हम इसे कैसे moderate करें ? 

डॉ सिल्विया – I would say like you know, अगर कुछ underlined cause है, जैसे कोई stress है या अगर कोई परेशानी है, Blood pressure ठीक नहीं है, तब आप ऐसे react करते हैं… और अगर आपको भूख लगी है और लोग आपसे कुछ और ही बात कर रहे हैं… तो उस समय गुस्सा आ सकता है… कोई underlined mechanism रहेगा… We should deal with those things… इसके पीछे कोई वजह होगी… इसका direct food intake से लेना-देना नहीं है… मगर there are certain types of food which make you more energetic… और सात्विक खाना will make you more calm… 

Music break 

डॉ़ सिल्विया और डॉ नीलांजना से बात करके फ़ूड और मूड का कनेक्शन काफी कुछ समझ आ गया… और मैं food को लेकर quotes पढ़ने लगी… जैसे मैंने पढ़ा कि Good food is Good mood… एक और है – Good food is the foundation of genuine Happiness… तो ये good food क्या है इस पर आपको खुद गहन चिंतन करने की ज़रूरत है… कि कब क्या खाने से आपको कैसा महसूस होता है… 

फ़ूड और मूड के विज्ञान पर रिसर्च करने वाले एक्सपर्ट्स ये भी बताते हैं कि अगर आप unhealthy diet ले रहे हैं तो आपके शरीर में कुछ bad bacteria होते हैं जो happy hormones के secretion को कम कर देते हैं… 

Music Break 

वैसे तो भोजन का आपके मूड से कनेक्शन बहुत सारी बातों पर निर्भर करता है जैसे –  आपने भोजन किस समय किया ? मतलब breakfast, breakfast के समय किया या lunch time पर… दफ्तर में Lunch time पर क्या आपने सुकून से बैठकर खाना खाया ? डिनर कहीं इस guilt के साथ तो नहीं किया कि रात को 12 बजे दफ़्तर से आकर अब खाना खा रहा हूँ… और सबसे ज़रूरी बात – जो भी भोजन आप कर रहे हैं, क्या उसमें सारे nutrients हैं जो आपको सेहतमंद बनाने के लिए के लिए होने चाहिए ? 

मशहूर nutritionist Rujuta Diwekar ने अपनी किताब ‘Don’t lost your mind, lose your weight’ में Eating right के 4 principles बताए हैं… जिसमें वो बताती हैं कि अगर आपका शरीर active नहीं है… आपकी lifestyle lethargic है… या आप relax करने के mood में हैं तो आपके शरीर के cells भी nutrients absorb करने के मूड में नहीं होते हैं… क्योंकि वो ये भांप जाते हैं कि energy demand तो है ही नहीं… ऐसे ही जब शरीर के आराम का समय है, अगर उस समय आपने दुनिया का सबसे healthy food भी खाया तो भी आपका शरीर उसे digest करने के मूड में नहीं होगा… 

इस किताब को पढ़ने के बाद food groups और nutrients को लेकर मेरे मन में कई सवाल आए… डॉ नीलांजना हमारे साथ बनी हुई हैं आइए उनसे ही इस विज्ञान को समझते हैं… 

नेहा त्रिपाठी – Food groups में proteins, carbohydrates जैसे nutrients की हम बात करते हैं… इसके अलावा आज कई antioxidants, superfoods जैसी तमाम terms आ रहे हैं… अलग-अलग चीज़ें सुनने को मिलती हैं हमें… ये सब हमारे दिमाग को कैसे affect करता है… हमारे mood को कैसे affect करता है… अगर हम इस तरह का खाना खाएं तो… 

डॉनीलांजनासिंह खाना जब हम खाते हैं तो it is broken down into simpler chemicals… जैसे कि carbohydrates are broken down into starch molecules… उसमें से serotonin निकलता है… ये brain chemical है and it elevates your mood… इसलिए कई बार लोग कहते हैं कि carbohydrates मत खाइए… लेकिन carbohydrates are essential… लेकिन इस तरह के carbohydrates खाने चाहिए जिसमें complexity हो, जो धीरे-धीरे टूटे… ये नहीं कि हम जैसे ही खाएं, हमारे शरीर में sugar बढ़ जाए, फिर हमारे शरीर को insulin बनाना पड़े… तो हमारे blood sugar में बहुत fluctuations आ जाएंगी… तो carbohydrates से हमें serotonin मिलता है, feel good factor… Proteins जो हम खाते हैं, they are broken down into amino acids… जो हमारे शरीर के लिए  building blocks का काम करते हैं… इससे हमें dopamine और norepinephrine… ये सब हमारी alertness और concentration को बढ़ाती हैं… परीक्षाओं से पहले हम इसलिए बच्चों को कहते हैं कि proteins खाएं जिससे concentration, ability to pay attention बढ़ती है… 

नेहात्रिपाठी इसी तरह जैसे फल और सब्ज़ियाँ खाने के लिए हमेशा कहा जाता है… अगर आप भूखे हैं तो snacking के लिए फल और सब्ज़ियाँ खा लीजिए… लेकिन most of the fruits and vegetables we see today are artificially ripened… ये कितना सेहतमंद होगा ? आप कैसे देखती हैं ? 

डॉनीलांजनासिंह फल और सब्ज़ियों में ढेर सारे रंग होते हैं… ये जितनी तरह की आप खाएँ वो अच्छा है… ऐसा नहीं है कि मैं सिर्फ़ लौकी खाती हूँ या तरोई खाती हूँ… तो बहुत अच्छा कर रही हूँ… अलग-अलग तरह की फल और सब्ज़ियाँ खाएँ… और जैसा कि आपने कहा कि रंग… artificial colours डाले जा रहे हैं तो इसके लिए consumer awareness बहुत ज़रूरी है… अगर हम कहें कि नहीं हमें फीका रंग ही चलेगा… artificial रंग वाले फल और सब्ज़ियां नहीं चाहिए… तो धीरे-धीरे फल-सब्ज़ी बेचने वाले भी नहीं डालेंगे… ये consumer awareness आनी चाहिए… कई बार कच्चे फल मिलते हैं तो उन्हें आप घर ले जाइए… कागज़ में लपेटकर गरम जगह पर रख दीजिए… और वो अपने आप पकता रहेगा… आप देखते रहिए… ये process धीमा है… धीरे-धीरे पकता रहेगा… आज कल के जीवन में हम चाहते हैं कि सब जल्दी-जल्दी हो जाए… तो आप कच्ची चीज़ें लीजिए और उसको धीरे-धीरे पकाकर खाइए… 

नेहात्रिपाठी पका हुआ खाना खाने से क्या मूड पर कुछ अलग असर होता है ? 

डॉनीलांजनासिंह खाने का असर मूड पर होता है ये हमने बहुत देर से जाना। पहले जो चरक संहिता में बात होती थी सात्विक खाने की… खाना कैसे खाना चाहिए… चबाकर खाना चाहिए… कैसे खाना पकाना चाहिए धीमी आँच पर… लेकिन nutrition psychiatry अब बहुत ज़रूरी हो गई है… और हर खाने में सबसे ज़रूरी है mindfulness… अगर आप mindfully खाएं या पकाएं तो बहुत फर्क पड़ता है… आप गुस्से में खाना खा रही हैं तो उसके बाद आपको कोई न कोई परेशानी होने लगेगी। अगर आप ग़ुस्से में खाना पकाएँ तो आप जल्दी-जल्दी तेज़ आँच पर पकाएँगी, आपको मज़ा नहीं आएगा… और हो सकता है कि उसमें नमक और मसालों का तालमेल गड़बड़ हो जाए… इसलिए समय निकालकर आप भले ही एक ही चीज़ बनाएँ… मैं तो इस बात की बहुत वकालत करती हूं… ये नहीं कि दस चीज़ें बनानी हैं… बस एक ही बनाएँ पर धीरे-धीरे प्यार से सोच कर बनाएँ… तभी जब आप खाएँगी तो हर स्वाद को आप relish कर पाएँगी। नहीं तो it will have excessive flavour which you will probably not enjoy and probably not be of benefit… 

Music Break 

वैसे हमारे खान-पान पर आयुर्वेद का काफ़ी प्रभाव देखा गया है… घर में बड़े बुज़ुर्ग मसालों से लेकर food combinations तक आयुर्वेद का हवाला देते हैं तो इस सारी बातचीत में मैंने आयुर्वेद एक्सपर्ट डॉ मधुमिता कृष्णन को भी जोड़ा है… 

नेहात्रिपाठीHi, Dr. Madhumitha… Welcome to the show… 

डॉमधुमिता Hello, Thank you so much for having me… this seems to be a very interesting topic… 

नेहात्रिपाठीआयुर्वेद के हिसाब से अगर हम समझना चाहें… अलग-अलग तरह का जो भोजन होता है वो हमारे मन में किस तरह का भाव लाता है? 

डॉमधुमिताखाने को कैसे समझें आयुर्वेद में… किसी से भी पूछो कि खाने को कैसे समझे तो बोलेंगे कि इसमें कितना कैलोरी है… carbohydrate content है… protein है… जो खाने का biochemical content होता है… आयुर्वेद में उसी खाने को थोड़ा अलग perspective से देखते हैं… अभी मैं एक सेब खाऊँगी तो मैं उसको कैसे समझ सकती हूँ? वो अच्छे से पका हुआ है… soft है… खाने के समय उसका जो sweetness मेरे मुंह में आता है… उसके साथ जो sourness है… वो पूरा हमारे मुंह में आ जाता है… इसको खाने का sensorial appreciation बोलते हैं… हमारे senses जो होते हैं, with regard to sound, touch, taste, कैसे दिखता है खाना और smell… खाने के बारे में अगर पहले sensorial appeal की बात करें वो होता है रस या taste… आयुर्वेद में 6 तरह के रस होते हैं… मधुर मतलब sweet, अम्ल मतलब sour, लवण मतलब salty, कटु मतलब pungent, तिक्त मतलब bitter और कषाय मतलब astringent…  हर एक रस का जो असर होता है हमारे शरीर पर वो बहुत अलग होता है… जैसे जब भी हमें अच्छा लगना है, किसी को कुछ देना है… प्यार से देना है… उनको अच्छा लगे इसके लिए कुछ करना है… तो हम मिर्ची तो नहीं देंगे… हम उन्हें कुछ मीठा देंगे… मीठे की वजह से good relaxation होता है… नींद अच्छे से आना, जो भी cheerfulness, vitality, satisfaction, compassion मधुर रस से आता है… मधुर रस का मतलब ये नहीं है कि शक्कर… पूरी range of substances है… जैसे चावल खाते हैं उसमें sweetness होता है… दूध पीते हैं, उसका sweetness होता है… ये पूरा जो category of foods होते हैं जो मधुर रस होते हैं वो ये feeling लाते हैं मन में… दूसरा जब लवण के बारे में बात करेंगे तो वो क्या करता है… वो हमें confidence देता है, enthusiasm देता है… कुछ करना है ज़िंदगी में… zest for life… वो सब लवण या salty tasting substances से आता है… जब खटु रस या pungent taste की बात करते हैं तो वो जब भी किसी को कुछ बाहर के लोगों के साथ बात कराना है… extrovert लोगों में spicy taste लाता है… Clarity of mind देता है… नींद छोड़ पढ़ाई करना है तो spicy substance दे सकते हैं… और जो bitter होता है वो आसानी से किसी को पसंद नहीं आता है… वो किसी की पहली पसंद नहीं होगी… ये हमारे अंदर introspection लाना है… हमारे अंदर क्या हो रहा है ये देखना है तो bitter taste लाता है… A sense of isolation, सबसे अलग रहना है… मुझे meditation करना है, ये सब तिक्त रस से आता है… जो कषाय रस या astringent taste है, ये सब को समझ में नहीं आता है कि ये क्या है… ये ज़्यादा लेने से नींद कम हो जाता है, डर लगने लगता है, मन इधर-उधर होने लगता है… हर एक रस या taste का हमारे मन पर अलग असर होता है… इसलिए हमें क्या चाहिए वो रस ज़रूर लेना चाहिए… 

नेहात्रिपाठीआयुर्वेद के मुताबिक़ तीन तरह की प्रवृत्तियाँ होती हैं… वात, पित्त और कफ़… हम सभी इनमें से एक कैटेगरी में फ़िट होते हैं… ऐसे में हम अलग-अलग प्रवृत्तियों वाले लोग कैसे खाने का चयन करें कि हमारा मूड ठीक रहे, अच्छा रहे, balanced रहे… 

डॉमधुमितासंसार में सात बिलियन लोग हैं… हर एक इंसान अलग होता है… जो उनको अच्छा लगता है, बुरा लगता है… उसके हिसाब से अलग होता है… आयुर्वेद ने इसे simplify कर दिया… पूरी जनसंख्या को 7 categories में divide कर दिया… depending upon the dominance of the doshas… एक ही दोष का dominance है तो वो वात, पित्त या कफ हो सकता है… ये तीन तरह के हुए… इसके अलावा combination of two होते हैं… वात-पित्त, पित्त-कफ, कफ-वात… तो ये ६ तरह की प्रकृति हो गई… और आखिर में तीनों का equilibrium होता है… तीनों की equal quantities होते हैं… वो हो गया सातवां प्रकृति… हमारी जनसंख्या में सबसे ज़्यादा combination of two वाली प्रकृति पाई जाती है… इसी तरह जो रस के बारे में पात किया था, 6 तरह के रस होते हैं… तो तीन रस किसी दोष को ज़्यादा करता है और तीन रस उसी दोष को कम करता है… हर एक इंसान में तीन दोष है… मतलब हर एक इंसान को छ रस लेना चाहिए but depending upon the dominant दोष, उनको रस की quantity vary करना पड़ेगा… जैसे जब वात का dominance होता है उनको मधुर, अम्ल, लवण लेना चाहिए… बाकी तीनों रस कम लेना चाहिए… 

नेहात्रिपाठी Depression या anxiety या traumatised feel कर रहे हैं लोग… तो किस तरह का खाना आप suggest करेंगी जो मदद कर सकें लोगों की, उनका मूड uplift करने में… और strong feel करने में? 

डॉमधुमिता खाने का बहुत बड़ा असर है दिमाग़ पर… आहार की जो परिभाषा दी गई है… वो बताता है कि जो भी ख़ाना दिमाग को अच्छा लगता है वो हमारे लिए सबसे अच्छा है… 

Podcast के लिए रिसर्च करते हुए मैंने हार्वर्ड हेल्थ पब्लिकेशन का एक article पढ़ा… इसके अनुसार, जब हम दिमाग़ को अच्छा खाना देते हैं तो ये अच्छा काम करता है… ये बिल्कुल वैसे ही है जैसे हम अपनी कार को प्रीमियम fuel देते हैं, तो वो बिल्कुल smooth, बिना किसी आवाज़ के चलती है… 

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि मन अन्न से बना है… मतलब जो भी खाना हम खाएँगे उसका असर मन पर होगा… इसलिए अन्न की शुद्धता से मन की शुद्धता होती है… मन की शुद्धता से स्वभाव की शुद्धता बनी रहती है… 

मैंने इस बारे में मुझे महाभारत का एक प्रसंग याद आ रहा है… 

एक बार श्रीकृष्ण पांडवों के दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे… वे दुर्योधन के पास गए और उसे सलाह दी कि वो पांडवों से युद्ध न करे। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को बहुत समझाया लेकिन, वो नहीं माना। इसके बाद दुर्योधन ने अपने महल में श्रीकृष्ण को भोजन के लिए आमंत्रित किया… लेकिन श्रीकृष्ण ने दुर्योधन का प्रस्ताव ठुकरा दिया…  दुर्योधन को इससे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने श्रीकृष्ण से पूछा कि वे उसके यहां भोजन क्यों नहीं करना चाहते हैं? श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से कहा कि भोजन तो प्रेमवश किया जाता है… इसलिए मैं तुम्हारे यहां भोजन नहीं कर सकता। दुर्योधन से मिलने के बाद श्रीकृष्ण विदुर के घर गए… और वहां सादा भोजन किया… यानी जहां मन को अच्छा लगे, भोजन वहाँ करना चाहिए… 

डॉ मधुमिता हमारे साथ बनी हुई हैं… उनसे आख़िर में समझते हैं कि खाना पकाने का भी खाने और मूड के कनेक्शन से कोई रिश्ता होता है? 

डॉमधुमिताएक स्टडी किया गया जिससे पता चला कि जो भी पानी की चीज़ है उसका हम पर positive effect होता है… और अगर हम कुछ negative चीज़ कर रहे हैं तो वो energy भी पानी absorb कर लेता है… और खाना पकाते समय हम पानी का इस्तेमाल तो करते ही हैं… हमारा मूड अच्छा नहीं है, हमें अच्छा नहीं लग रहा है… हमारा मन नहीं कर रहा है… ऐसे में खाना पकाएंगे तो मूड खाने पर असर डालेगा और जब खाना खाएंगे तो negative energy हमारे अंदर आ जाएगा… तो जब खाना बना रहे हैं तो अच्छा होगा कि संगीत सुनें, chanting करें, जो भी हमें अच्छा लगता है, जैसे किसी को अलग-अलग तरह के चाकू पसंद हैं… साफ-सुधरी जगह पर खाना बनाएं, अच्छी जगह हो, लाइट्स अच्छी हों, इस सब से मन में अच्छा लगता है… तो जब खाना पकाने में मज़ा आता है… जब a person enjoys जो खाना पका रहा है… कैसे बना रहे हैं ? अच्छे मूड में बना रहे हैं तो खाने पर भी असर पड़ जाता है और खाने वाले को भी असर पड़ जाता है… 

आख़िर में आपके लिए एक Spanish proverb which says – The Belly Rules the Mind… यानी आपका पेट आपके दिमाग़ पर शासन करता है… 

मुझे उम्मीद है कि इस बातचीत ने आपके जीवन में कुछ नया जोड़ा होगा… आपके मूड और फूड कनेक्शन को लेकर SipSci Vocal का ये एपिसोड आपको कैसा लगा मुझे ज़रूर बताइएगा… इस podcast को आप गाड़ी चलाते हुए… किचन में खाना बनाते हुए… morning या evening walks पर… पार्क में बैठे हुए… मेट्रो में सफर करते हुए… या फिर काम से एक छोटा सा ब्रेक लेकर… आप कभी भी, कहीं भी हमें सुन सकते हैं… ये podcast Hinglish में है… इसकी हिन्दी और अंग्रेज़ी transcript nehascope.com पर आप पढ़ सकते हैं… और अगर आप इस पूरी बातचीत को देखना चाहें तो SipSci के यूट्यूब चैनल पर देख भी सकते हैं… सारी ज़रूरी जानकारियां description में है… आप कमेंट्स के ज़रिए अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं… इस पॉडकास्ट को सब्सक्राइब के साथ साथ शेयर करेंगे तो विज्ञान के लिए इस छोटे से प्रयास को आगे बढ़ने का हौसला मिलेगा। 

English Transcript

Hello and Welcome to SipSci Vocal… Kabhi Global, Kabhi Local… I am the host of this show Neha Tripathi… and today I have brought this for you…

Various Audio – Cooker whistle, dal sizzle and masala grinding sound 

All these sounds are coming from my kitchen… On one side dal is being cooked… the cooker is whistling… On the other side vegetable is cooking… and chutney is being grinded in the mixer… I am even making chapatis… that means dinner is almost ready…

Now the question is why did I make this dinner today ? Because I had to prepare this podcast, less time, more work… so I chose this menu… Although if the time is less, then we can order food from outside also… but today I am in no mood to eat outside food. Why so? Let’s understand the connection between this mood and food… 

There are many types of moods… like happiness, sadness, depression, fear, anger… etc… In happiness we know that we turn on party mode and the menu of the party is almost decided… but when you are sad or depressed, then ? By eating which food the mood is like a bright sunny day… and eating which kind of food makes the mood dull and boring? What kind of food do we eat when we get angry or eating what kind of food makes us angry? Know all about this today… 

Music Break

So I started going through my phonebook… Found Dr. Nilanjana Singh, a well-known nutrition therapist and talked to her… 

Neha Tripathi – Hello Dr. Neelanjana… Thank you so much for taking out time for us…

Dr. Nilanjana Singh – Glad to be here Neha ji… Thank you for inviting me… 

Neha Tripathi – What we are talking about today is what is the connection of food with mood? So I ask you a direct question that if at this time I am feeling like eating a lot of kachoris, jalebis, samosas, pakodas or such spicy things… then how is my mood actually? 

Dr. Nilanjana Singh – Interesting question Neha ji… First of all I would like to say that it is perfectly normal to eat samosa, kachori sometimes… it is not abnormal body physiology… but if you feel like eating this type of food all the time… If this is happening… and you do not feel like eating the rest of the food like vegetables, fruits, pulses… so it has to be examined whether you are in depression or not… Is your mood low due to any reason… Are you not getting enough sleep? Is there a lack of fibre in your diet… Because of these things, you may feel like eating fried and spicy… If you feel like eating like this everyday then… 

Neha Tripathi – And if it is happening sometimes then? What does this mean ? 

Dr. Nilanjana Singh – When we celebrate, we eat different food… so that is normal…

Neha Tripathi – Just like porridge, oats or sprouted food… or fruits and vegetables like you just mentioned… it is considered healthy food… but some people call it sick food… How do you see it… Are these sick food? 

Dr. Nilanjana Singh – This question is also interesting… In our culture things go away or get deeply engraved… In many Asian culture Buddha bowl or one dish meal which we call Khichdi is known… It is very appetizing food… You can eat with great fervor… but here we feel that we eat khichdi only in illness… In normal diet we cannot eat khichdi… There is a lot of connection to it… and now that we have exposure to different cultures, we eat khichdi as a risotto… and if you tell children interesting names, they eat khichdi happily… but if we say khichdi, then they feel sick food… 

Anything can spoil youur mood… like you love eating poha and you made poha with full enthusiasm and happiness and when you sat down to eat it, then you came to know that there is too much salt in it… Now, next time when you will make poha, even though it is your favourite food, there will be more tension than happiness this time… Whether this time poha will be properly cooked or not… In such a situation, the confusion is whether the poha with more salt spoiled the mood or the mood was bad, so you pout more salt in poha? 

Let’s add Dr. Sylvia Fernandez Rao to this conversation… She is a psychologist at the National Institute of Nutrition… She has done a lot of work on nutrition and behaviour…

Neha Tripathi – Hi Dr. Sylvia, Good to have you on the show.

Dr. Sylvia – Hi Neha, Thank you for having me… It’s a pleasure…

Neha Tripathi – Dr. Sylvia, being a psychologist, In this show we want to understand from you that how our mood affects our food choices? Accordingly, we decide our food, menu for the day? Or does the food we choose affect our mood? Our mood is good, bad, low, high… what is the relationship between food and mood? 

Dr. Sylvia – Think for yourself that if you do not get breakfast in the morning… then how will be your mood? Irritable… What will the child do if the child does not get milk on time? He/she will cry… When your mood is bad, due to not getting food… in such a situation, when you choose to eat then you consume what you lack… The more you will feel like eating food… your sugar level will decrease, so if you are hungry, after a long time when you eat food, you will like to eat a lot of carbohydrates, which will balance your body… So when your cycle is disturbed, you will choose food accordingly. The flip side is that when we are feeling low…feeling depressed…then we feel like eating food which are rich in fats and sugar… Like this kind of food have a sense of elevating your body… Due to this the neurotransmitters we have… the dopamine levels are high… and we are attracted towards this type of food…

Neha Tripathi – You just mentioned dopamine, so dopamine is also called the reward center of our brain… when we are eating something good, dopamine is released… we feel happy, we feel good… we eat fried food and we feel like we are rewarding ourselves… so if we reduce this type of food because we know it is not right… we should not eat like this everyday… If we do this, If we do not eat then this dopamine hormone which is there will be less secreted… then which hormone would be secreted after that can help us to balance? 

Dr. Sylvia – It’s not just with the food, it’s when you do something good… Achieve something that you have got after hard work… Got a promotion… Fell in love with someone… Or have eaten good food… So in all these, same mechanism works in all situations… It should be more than expectation if you want that feeling then… Like a movie review, if someone exaggerated and you went and saw the movie… it may not meet your expectations… just like that now you eat so much… so you reach next level… To get high, you will have to eat more often… only then you will get that level of satisfaction… Those who start eating too much while some people stop eating at all… so what kind of food should be eaten in depression so that your mood is right… and be better… 

Dr. Sylvia – It is absolutely true what you said that when it is uncontrollable, high and personal stress food is not taken… At this time, appetite is suppressed… and in psychosocial issues where you have interaction with society or others, which comes from comparison or relationship, so you tend to eat more… From there comes comfort eating or stress eating… Now that you asked what kind of food should be eaten in depression… then you should have a balanced diet… But keep in mind… more than half of your plate should be fruits and vegetables… and a quarter should be carbohydrates… their sugar release is not rapid… it happens slowly… That way all your other mechanisms fall in place… Also nuts, proteins, kidney beans, chickpeas, cowpeas etc… has health related benefits, not just depression related… 

Neha Tripathi – Also we need to understand that at times some people get very angry, then is there any kind of food which helps in controlling anger? Or there is some food which gives a lot of anger… So how do we moderate our anger with food?

Dr. Sylvia – I would say, like you know, if there is some underlined cause, like stress or if there is some problem, if the blood pressure is not right, then you react like this… and if you are hungry and people tell you something else… If you are forced to talk about it… then there may be anger… There will be some underlined mechanism… We should deal with those things… There must be some reason behind this… It has nothing to do with direct food intake… But there are certain types of food which make you more energetic… and sattvik food will make you more calm… 

After talking to Dr. Sylvia and Dr. Nilanjana, I understood a lot about the connection between food and mood… and I started reading quotes about food… Like I read that ‘Good food is Good Mood’… There is another one – ‘Good Food is the Foundation of Genuine Happiness’… so you need to think deeply on what is this ‘Good Food’… that how you feel when you eat what… 

Experts doing research on the science of food and mood also suggest that if you are taking an unhealthy diet, there are some bad bacteria in your body that reduce the secretion of happy hormones…

Music Break

By the way, the connection of food with your mood depends on many things like – at what time did you eat your meal? Means breakfast, done at breakfast time or at lunch time… At lunch time in office, did you sit comfortably and ate food? Didn’t have dinner somewhere with the guilt that after coming from office at 12 o’clock in the night, I am now eating… and most importantly – Whatever food you are eating, does it contain all the nutrients that you need to be healthy? 

Famous nutritionist Rujuta Diwekar in her book ‘Don’t lose your mind, lose your weight’ has given 4 principles of Eating right… in which she tells that if your body is not active… your lifestyle is lethargic… or you have to relax… then your body cells are also not in the mood to absorb the nutrients… because they sense that there is no energy demand. Even if you eat healthy food, your body will not be in a mood to digest it.

After reading this book, many questions came to my mind regarding food groups and nutrients… Dr. Nilanjana is still with us, let us understand this science from her only… 

Neha Tripathi – In food groups we talk about nutrients like proteins, carbohydrates… apart from this, many terms like antioxidants, superfoods are coming in these days… We get to hear different things… How all this affect our brain… How does it affect our mood… If we eat this kind of food then what happens? 

Dr. Nilanjana Singh – The food we eat, is broken down into simpler chemicals… like carbohydrates are broken down into starch molecules… It releases serotonin… This is the brain chemical and it elevates your mood… so many times people say Don’t eat carbohydrates… but carbohydrates are essential… So there will be a lot of fluctuations in our blood sugar… So we get serotonin from carbohydrates and it has a feel good factor… Proteins we eat are broken down into amino acids… which act as building blocks for our body…. Dopamine and norepinephrine… All these increase our alertness and concentration… That’s why before exams we ask children to eat proteins which increases concentration, ability to pay attention… 

Neha Tripathi – Just like it is always said to eat fruits and vegetables… if you are hungry then eat fruits and vegetables for snacking… but most of the fruits and vegetables we see today are artificially ripened… how healthy would that be? 

Dr. Nilanjana Singh – Fruits and vegetables have a lot of colours… the kind you eat is good… it is not that you say I eat only lauki or taroi… so doing very well… We eat different types of fruits and vegetables… and as you said colour… artificial colours are being added then consumer awareness is very important for this… If we say no we will take fruits and vegetables with faded colour… We do not want artificial coloured fruits and vegetables… So slowly-slowly even the sellers of fruits and vegetables will not put colours… This consumer awareness should come… If you get raw fruits many times, then take them home… Wrap them in paper and keep them in a warm place… and they will continue to ripen by itself… keep watching… This process is slow… It will continue to ripen slowly… In today’s life we ​​want everything to happen quickly… But, its better that you take raw things and ripen them slowly and eat them… 

Neha Tripathi – Does eating cooked food have a different effect on mood? 

Dr. Nilanjana Singh – We have known too late that food has an effect on mood. Earlier in the Charak Samhita, it was taught to eat sattvik… How to eat food… how to eat after chewing properly… how to cook food on low flame… but nutrition psychology has become very important now… and the most important thing in every meal is mindfulness… If you eat or cook mindfully, it makes a lot of difference… if you are eating food in anger then you will start having some problem after that. If you cook with anger, you will cook it on high heat very quickly, you will not enjoy it… and it may be that the combination of salt and spices may be messed up… I advocate cooking single dish… it is not that ten things have to be made… just make one but slowly make it by thinking with love… only then you will be able to relish every taste… Otherwise it will have excessive flavour which you will probably not enjoy and probably not be of benefit… 

By the way, a lot of influence of Ayurveda has been seen on our food and drink…. 

Neha Tripathi – Hi, Dr. Madhumitha… Welcome to the show…

Dr. Madhumitha – Hello, Thank you so much for having me… this seems to be a very interesting topic… 

Neha Tripathi – According to Ayurveda, if we want to understand… what kind of feeling does different types of food bring to our mind? 

Dr. Madhumita – How to understand food in ayurveda? Ask anyone, how to understand food, they will say – how many calories are there…  How much carbohydrate content… How much protein… What is the biochemical content of food… In ayurveda the same food has a slightly different perspective… Let’s see… now If I eat an apple so how can I understand that? It is well ripened… it is soft… the sweetness that comes in my mouth at the time of eating… the sourness that comes with it… that whole comes in our mouth… it speaks of sensorial appreciation of food… our senses are, with regard to sound, touch, taste, how the food looks and smells… If we talk about the sensorial appeal of food first, it is rasa or taste… In Ayurveda there are 6 types of rasa… Madhur means sweet, Amal means Sour, Lavana means salty, Katu means pungent, Tikta means bitter and Kashaya means astringent… The effect that each juice has on our body, is very different… Like whenever we want to feel good, we have to give something to someone with love… then we will not give chillies… we will give them something sweet… sweet causes good relaxation… good sleep, whatever cheerfulness, vitality, satisfaction, compassion comes from sweet juice… Sweet juice does not mean that it is only sugar… There is a whole range of substances… Just like rice we eat has sweetness… the milk we drink, it has sweetness… These are the whole category of foods which have sweet juices… they bring this feeling in mind… Second when talking about salt what does it do… It gives us confidence, gives us enthusiasm… brings zest for life… all that comes from salty tasting substances… When we talk about sour juice or pungent taste, then whenever someone has to talk with some outside people… extrovert people like spicy taste… It brings clarity of mind… If you want to study without sleep, you can give spicy substance… And what is bitter is not easily liked by anyone… It will not be anyone’s first choice… It brings introspection in us… It is to see what is happening inside us, then bitter taste brings a sense of isolation, to be different… Feeling that I have to meditate, all this comes from tikta rasa… kashaya rasa or astringent taste is not everyone’s cup of tea… Taking this too much reduces sleep, one starts feeling scared… the mind starts moving here and there… Every taste has a different effect on our mind… It happens… so what we want, we should definitely take that juice… 

Neha Tripathi – According to Ayurveda, there are three types of tendencies… Vata, Pitta and Kapha… We all fit into one of these categories… So how do we people with different tendencies choose to eat so that our mood is right and well balanced? 

Dr. Madhumita – There are seven billion people in the world… every person is different… what they like, what they feel is different… Ayurveda simplified it… Divided the entire population into 7 categories, depending upon the dominance of the doshas… if there is a dominance of one dosha then it may be vata, pitta or kapha… these are of three types… Furthermore, there are combination of two… vata-pitta, pitta-kapha, kapha-Vata… so there are six types of nature… and in the end all three are in equilibrium… All three have equal quantities… that has become the seventh nature… the nature with the highest combination of two is found the most in our population… About rasa, there are 6 types of rasa… so three rasa increases any dosha and three rasa reduces the same dosha… every person has three doshas… that means every person should take six juices… but depending upon the dominant dosha, they have to vary the quantity of rasa… e.g. when vata is dominant they should take sweet, acidic, salty tastes… rest three rasas should be taken less in quantity… 

Neha Tripathi – People suffering from depression or anxiety or feeling traumatised… so what kind of food would you suggest that can help people in uplifting their mood… and feeling strong?

Dr. Madhumita – There is a huge effect of food on the brain… the definition of diet has been given… it tells that whatever food is good for the mind is best for us… 

While researching for the podcast, I read an article from Harvard Health Publication… According to this, when we give good food to the brain, it works well… It is just like we give premium fuel to our car, so that it runs absolutely smooth and runs without any sound…

It is said in our scriptures that the mind is made of food… This means whatever food we eat will have an effect on the mind… so purity of food leads to purity of mind… purity of mind maintains purity of nature…

This reminds of an incident from Mahabharata… 

Once Shri Krishna went to Hastinapur as the messenger of the Pandavas… He went to Duryodhana and advised him not to fight with the Pandavas. Shri Krishna explained a lot to Duryodhana but, he did not agree. After this Duryodhana invited Shri Krishna to his palace for a meal… But Shri Krishna turned down Duryodhana’s offer… Duryodhana was very surprised by this. He asked Shri Krishna why he did not want to eat food at his place? Shri Krishna told Duryodhana that food is eaten out of love… so I cannot eat food with you. After meeting Duryodhana, Shri Krishna went to Vidur’s house… and had simple food there… Moral is, where the mind feels good, food should be eaten there… 

Dr. Madhumita is still with us… Help us understand that even cooking establishes a relationship between food and mood? 

Dr Madhumita – A study was done which showed that whatever water is there, it has a positive effect on us… and if we are doing some negative thing then that energy is also absorbed by water… We use water while cooking… then even if our mood is not good, we are not feeling well… we are not feeling good… While cooking, this negative energy will go into the food… So, it would be good to listen to music, chant, do whatever we like, while cooking food… For example, if someone likes chopping, he can use different types of knives… Cook in clean place… Cook in good light… All this makes us feel good… Cooking is fun… and the person enjoys cooking… So, it is very important how are you cooking food? If you are made food in good mood, then the food also gets affected and the person who eats it also gets affected… 

Finally a Spanish proverb for you which says – The Belly Rules the Mind… i.e., your stomach rules your mind…

I hope this conversation has added something new to your life… Let me know how you felt about this episode of SipSci Vocal regarding your mood and food connection… Listen to this podcast while you drive… while cooking in the kitchen… On morning or evening walks… While sitting in the park… While traveling in the metro… or Taking a short break from work… You can listen to us anytime, anywhere… This podcast is in Hinglish… its Hindi and English transcript are available on nehascope.com, you can read it there… and if you want to see the whole conversation, you can also watch it on SipSci’s YouTube channel… All the important information is in the description… You can give your feedback through the comments as well… Along with subscribing to this podcast If you share, then this small effort for science will get the courage to move forward. 

Science journalist | Anchoring & Conceptualising Science Infotainment Shows for Vigyan Prasar, Doordarshan & All India Radio | Indie Writer & Filmmaker | GOI Projects | Sci-Expert @ CIET, NCERT | 16 yr Experience

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