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Will Artificial Intelligence help you overcome procrastination ?

Note : This story was published in CSIR-NISCAIR’s prestigious Hindi magazine ‘Vigyan Pragati’ in March 2025.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से प्रोक्रास्टिनेशन पर मिलेगी जीत ?
क्या AI आपकी प्रोकास्टिनेशन की आदत बदल सकता है?

बड़े-बुज़ुर्ग सिखाते हैं 

“काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब।” 

संत कबीर के इस दोहे में जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र छिपा है। 

लेकिन इसी दोहे का मज़ाक़ भी उड़ाया जाता है। 

कहा जाता है “आज करे सो कल कर, कल करे सो परसों… किस बात की जल्दी है, जब जीना है बरसों।” 

इस सोच से ही शायद प्रोक्रास्टिनेशन यानी टालमटोल का जन्म हुआ है। 

कभी ऐसा हुआ है कि काम की डेडलाइन सिर पर हो और आप सोचे, “अभी थोड़ी देर बाद कर लूंगा”, लेकिन वो ‘बाद’ कभी आता ही नहीं? क्या आपको लगता है कि आप अपनी जिंदगी के सबसे जरूरी कामों को हमेशा ‘कल’ पर टालते रहते हैं? अगर हां, तो आप अपने काम के साथ टालमटोल कर रहे हैं। ये हमारी जिंदगी का वो हिस्सा बन चुका है जो न केवल हमारे काम को देर से पूरा करता है, बल्कि हमारे सपनों, सेहत और मानसिक शांति पर भी असर डालता है। 

Box item 

टालमटोल क्या है?

टालमटोल (जिसे अंग्रेजी में ‘प्रोक्रास्टिनेशन’ कहते हैं) का अर्थ है किसी काम को जानबूझकर टालते रहना, चाहे वह कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो। ये समस्या हर उम्र, वर्ग और पेशे में देखी जा सकती है।

जब परफेक्शन की चाह बन जाए बाधा 

क्योंकि ये विषय लोगों से जुड़ा है तो लोगों से बात करना भी ज़रूरी है। यक़ीन मानिए उनकी बातें सुनकर ऐसा लगा जैसे कि आपके और मेरे मन की बात कह रहे हों। ख़ुद से ही शुरु करूँ तो, इस लेख को लिखने में मुझे लगभग दो महीने लग गए। कभी तबीयत ख़राब है। कभी कहीं बाहर जाना है। तो कभी घर में कोई आ गया है। जब तक मैंने चाह नहीं लिया, इस विषय पर लिखना नामुमकिन लग रहा था। आख़िर में एक दिन बैठकर सोचा कि मैं ये क्या कर रही हूँ तो ख़ुद को किसी समस्या में जकड़ा हुआ महसूस किया। 

मैंने जानी मानी मनोवैज्ञानिक अरूणा ब्रूटा जी से फ़ोन पर लम्बी बात की। उन्हें अपनी समस्या के बारे में बताया और कहा कि हर काम को करने में आलस आता है। तो उन्होंने समझाया “प्रोक्रास्टिनेशन और आलस में फर्क होता है। प्रोक्रास्टिनेशन का मतलब है काम को टालते रहना। आलस में इंसान काम के बारे में सोचना भी नहीं चाहता। उसकी सोच होती है कि ‘काम होता रहेगा’। लेकिन प्रोक्रास्टिनेशन में वो काम दिमाग में बना रहता है। आप उस काम को सबसे अच्छा बनाने की सोचते हैं, बार-बार मन में रिहर्सल करते हैं, लेकिन उसे करने के लिए बैठते नहीं। आप मन में एक ड्राफ़्ट बनाते रहते हैं, पर असल में काम शुरू नहीं करते।” उन्हें सुनकर लगा कि मेरे साथ दिक़्क़त आलस की नहीं, प्रोक्रास्टिनेशन की ही है। 

अरुणा जी ने अपनी एक केस स्टडी साझा की। उन्होंने बताया, “एक 23 साल का कंटेंट राइटर समय पर काम नहीं करता था क्योंकि वह हर चीज में परफेक्शन चाहता था। मैंने उसे समझाया कि बार-बार लिखने और सुधारने की आदत डालें। धीरे-धीरे उसका काम बेहतर हुआ।” एक दूसरे केस के बारे में उन्होंने कहा, “एक क्लाइंट को 6-7 नौकरियों से निकाल दिया गया था, क्योंकि वह समय पर काम पूरा नहीं कर पाता था। समस्या प्रोक्रास्टिनेशन थी। हमने उसकी आदतों को गहराई से समझा और अनुशासन व छोटे-छोटे सुधारों पर काम किया। अब वह काफी हद तक स्थिर है।” उन्होंने जोर दिया कि किसी आदत को इंसान की पूरी शख्सियत के साथ जोड़कर समझना जरूरी है और बदलाव के लिए समय और धैर्य चाहिए।

अरूणा जी की बातें सुनकर मैंने अपने आस-पास बहुत सारे लोगों से बात की। एक कॉलेज स्टूडेंट नेहा ने बताया कि पढ़ाई टालते-टालते परीक्षाएँ सिर पर आ जाती हैं। हर बार एग्ज़ाम की तैयारी आखिरी रात को करती है और घबराहट में कुछ याद नहीं रहता। मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले राजेश भी हर बार प्रोजेक्ट आखिरी मिनट पर करते हैं। “कल से शुरू करूंगा” सोचते-सोचते देर रात तक काम करना पड़ता है। 

ये दिक्कत सिर्फ ऑफिस तक सीमित नहीं। रीना ने वजन कम करने और योगा शुरू करने का सोचा, लेकिन हर सुबह अलार्म बंद कर सो जाती। “कल से पक्का करूँगी” कहते-कहते उसकी सेहत बिगड़ गई। आदित्य ने स्टार्टअप का सपना देखा, लेकिन ज्यादा रिसर्च के चक्कर में साल गुजर गए, और दूसरी कंपनियां आगे निकल गईं। सुमित ने कैमरा खरीदा, लेकिन “कल से शूटिंग शुरु करूँगा” सोचते-सोचते उसका कैमरा अलमारी में धूल खा रहा है। 

ये साफ है कि टालमटोल न सिर्फ काम पर, बल्कि सपनों और सेहत पर भी असर डालती है। बड़े सही कहते हैं, “कल कभी नहीं आता।” इसे पहचानें और बदलने की शुरुआत करें। आपकी शुरुआत इस लेख को पढ़ने से हो चुकी है—अब इसे अंत तक पढ़ें और कदम उठाना शुरू करें। 

एक छोटी सी आदत जो बड़े सपनों की दुश्मन है 

बड़े-बड़े लेखक, पथ-प्रदर्शक, रचनाकार, सब प्रोक्रास्टिनेशन को लेकर एक जैसी ही बातें करते हैं। जैसे महान लेखक मार्क ट्वेन कहते हैं कि “आगे बढ़ने का राज़ है कि आप शुरुआत करें। टालमटोल से बचने के लिए पहला कदम उठाना जरूरी है।” वहीं मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी ऐसा ही सोचते हैं कि “बड़े काम की शुरुआत छोटे कदम से करें। पहला कदम उठाना सबसे जरूरी है।” महान चित्रकार पाब्लो पिकासो मानते हैं कि “सफलता की कुंजी है – काम करना। बिना एक्शन के कोई काम पूरा नहीं हो सकता।” अमेरिकी उद्यमी, व्यवसायी और लेखक रॉबर्ट कियोसाकी भी सीधे और सरल शब्दों में बस इतना ही कहते हैं कि “आपका भविष्य आज के काम से बनेगा, कल के इंतजार से नहीं।” अंग्रेजी कवि एडवर्ड यंग तो टालमटोल को समय का सबसे बड़ा चोर मानते हैं। अगर इन सभी की बात माननी है तो शुरु से शुरु करना होगा। 

टालमटोल के पीछे केवल आलस नहीं, बल्कि कई मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और तकनीकी कारण जुड़े होते हैं। इसका समाधान तभी मुमकिन है जब व्यक्ति इन कारणों को पहचाने और सक्रिय रूप से अपनी आदतों को बदलने की कोशिश करे। टालमटोल के कई कारण हम सब जानते हैं। लेकिन अपने जीवन में टालमटोल से बचने का सबसे आसान तरीक़ा है अपने कारण को पहचानना। यहाँ जितने कारण लिखे हैं इनमें से कौन सा कारण आपको परेशान कर रहा है ? 

1. लोग अक्सर इस डर से काम को टालते रहते हैं कि वे इसे सही ढंग से नहीं कर पाएंगे या असफल हो जाएंगे। 

2. समय को सही तरीके से बांटने और योजनाएं बनाने की आदत न होने से काम अधूरे रह जाते हैं और अंतिम समय पर हड़बड़ी होती है। 

3. काम में रुचि की कमी या आलस भी बड़े कारण हैं, जिससे लोग जरूरी कामों को टालते रहते हैं। 

4. जो लोग अपनी क्षमताओं पर भरोसा नहीं कर पाते, जिनमें आत्म विश्वास की कमी होती है, वे किसी भी काम को शुरू करने में देरी करते हैं। 

5. अगर काम बहुत कठिन लगता है, तो लोग उसे शुरुआत करने से पहले ही टालने लगते हैं। 

6. जरूरी और कम जरूरी कामों के बीच फर्क न समझ पाना भी टालमटोल का बड़ा कारण है। 

7. कभी-कभी लोगों पर दूसरों की अपेक्षाओं का इतना दबाव होता है कि वे खुद के काम टालने लगते हैं। 

8. मानसिक थकावट और तनाव भी कारण बनते हैं। जब दिमाग पहले से ही भारी महसूस करता है, तो लोग काम करने का उत्साह खो देते हैं। 

एआईहमारेप्रोक्रास्टिनेशनकोकैसेसमझताहै

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) हमारे व्यवहार और आदतों को गहराई से समझने में सक्षम है। एआई की यही ताकत इसे हमारे प्रोक्रास्टिनेशन पैटर्न्स को पहचानने और उन्हें सुधारने में मददगार बनाती है। इसका सही इस्तेमाल करने पर हम अपनी उत्पादकता बढ़ा सकते हैं और समय का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं। इसके लिए एआई डेटा मॉनिटरिंग करता है। 

एआई ये देखता है कि हम अपना समय कहाँ और कैसे बिता रहे हैं। यह हमारे मोबाइल, लैपटॉप, और दूसरे डिजिटल डिवाइस की गतिविधियों को ट्रैक कर पैटर्न्स का पता लगाता है। अगर आप सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताते हैं, तो ऐ्आई इसे एक संकेत के रूप में पहचानता है कि आपका ध्यान भटक रहा है। एआई ये रिकॉर्ड करता है कि किन गतिविधियों में आपका समय बर्बाद हो रहा है और किस तरह की चीजें आपको रोक रही हैं। अगर आप किसी काम को बार-बार टाल रहे हैं, तो AI एल्गोरिद्म ये पता लगाता है कि ऐसा क्यों हो रहा है। एआई पहचान सकता है कि आपके प्रोक्रास्टिनेशन की आदत के पीछे कारण क्या है – तनाव, आत्मविश्वास की कमी, या काम को लेकर डर? 

एआई आधारित ऐप्स आपकी बातचीत और प्रतिक्रियाओं के आधार पर आपकी भावनात्मक स्थिति का आंकलन करते हैं। ये समझते हैं कि क्या आप तनाव में हैं, आत्मविश्वास की कमी महसूस कर रहे हैं, या किसी काम को लेकर डर रहे हैं। ये चैटबॉट आपकी समस्याओं को सुनते हैं और उनकी जड़ तक पहुँचने में मदद करते हैं। आपकी मानसिक स्थिति के आधार पर समाधान सुझाते हैं। 

AI आपकीनिजीज़िंदगीमेंप्रोक्रास्टिनेशनदूरकरनेमेंकैसेमददकरसकताहै

AI आपकी ज़िंदगी के हिसाब से काम करने का तरीका ढूंढता है। यह आपके पैटर्न्स को समझकर आपको छोटे-छोटे लक्ष्य हासिल करने में मदद करता है। AI आपके रोजमर्रा के जीवन का एक ऐसा सहायक बन सकता है जो आपको न सिर्फ प्रोक्रास्टिनेशन से बाहर निकालता है, बल्कि हर दिन को प्रोडक्टिव और मज़ेदार बनाता है। बस शुरुआत करने की ज़रूरत है। AI यह बता सकता है कि दिन का कौन सा समय आपके लिए सबसे ज्यादा उत्पादक है। अगर आप सुबह जल्दी उठने की आदत डालना चाहते हैं, तो AI आधारित टूल्स आपकी बेहतर नींद और सही समय पर जागने में मदद कर सकते हैं। यह आपकी टू-डू लिस्ट बनाते हैं और जरूरी काम पहले करने की याद दिलाते हैं। मान लीजिए, आपके पास घर का बजट बनाने का काम है। AI इसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांट देगा, जैसे पहले खर्चे जोड़ें, फिर बचत का हिसाब लगाएं।

कई बार हम काम टालते हैं क्योंकि मन ठीक नहीं होता। AI इस समस्या का हल भी निकाल सकता है। AI आधारित चैटबॉट्स आपकी भावनाओं को समझते हैं और ऐसा जवाब देते हैं जिससे आप बेहतर महसूस करें। अगर आप किसी काम को लेकर घबराए हुए हैं, तो ये चैटबॉट आपको आसान कदम उठाने का सुझाव देंगे। ये ध्यान लगाने, गहरी सांस लेने और रिलैक्स करने की ट्रेनिंग भी देते हैं। जैसे अगर आप ऑफिस के लंबे दिन के बाद थक गए हैं, तो यह 5 मिनट की मेडिटेशन से आपको रिचार्ज कर सकते हैं।

AI आपके लिए समय पर रिमाइंडर सेट करता है ताकि आप कुछ भी न भूलें। AI आधारित असिस्टेंट आपकी डेली रूटीन को ट्रैक करते हैं और सही समय पर अलर्ट भेजते हैं। जैसे अगर आपने शाम को वर्कआउट करने का प्लान बनाया है, तो यह आपको 30 मिनट पहले याद दिलाएंगे। ये टूल्स आपके कामों को दिन और समय के हिसाब से ऑटोमैटिक लिस्ट में डालते हैं। अगर आपको सब्जी लानी है, तो AI टूल पहले से लिस्ट तैयार कर सकता है और जरूरत के हिसाब से आपको रिमाइंड कर सकता है।

AI आपकी जिंदगी के उबाऊ कामों को भी दिलचस्प बना सकता है। यह आपके हर छोटे काम को गेम की तरह बना देता है। जैसे-जैसे आप अपने लक्ष्य पूरे करते हैं, आपको पॉइंट्स और रिवार्ड्स मिलते हैं। अगर आप रोज 30 मिनट पढ़ाई करना चाहते हैं, तो यह आपको हर दिन पॉइंट्स देगा, जिससे आपकी मोटिवेशन बढ़ेगी। AI यह समझता है कि आप कहाँ समय बर्बाद कर रहे हैं और कैसे उसे बेहतर बना सकते हैं। यह बता सकता है कि आपने दिन का कितना समय सोशल मीडिया पर बर्बाद किया और उसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है।

सफाई या कपड़े धोने जैसे काम टालने की बजाय AI आधारित शेड्यूलर की मदद से टाइमटेबल बनाकर पूरा करें। AI पढ़ाई को आसान और इंटरेक्टिव बनाता है। यह मुश्किल विषयों को छोटे हिस्सों में बाँटकर पढ़ने में मदद करता है। आपका डिवाइस AI का इस्तेमाल कर आपकी हेल्थ को मॉनिटर करता है और आपको सही समय पर वर्कआउट के लिए मोटिवेट करता है। यहाँ तक कि अगर आप खुद के लिए वक्त निकालने की कोशिश कर रहे हैं, तो AI आपको समय प्रबंधन में मदद करता है, ताकि आप काम और आराम के बीच बैलेंस बना सकें। 

क्याएआईप्रोक्रास्टिनेशनकोबढ़ासकताहै

एआई का मकसद हमारी जिंदगी को आसान और बेहतर बनाना है। लेकिन कभी-कभी यह काम टालने की आदत को और बढ़ा सकता है। ये तो हम जानते ही हैं कि एआई हमारी आदतों को समझकर उसी के हिसाब से चीजें पेश करता है। जब हम ऑनलाइन कुछ समय बिताते हैं, तो एआई लगातार उसी तरह की चीज़ें हमें ज़्यादा दिखाता है जो हम देख रहे होते हैं। इससे कई बार हमारा जरूरी काम टलता रहता है। एआई हमारी हर गतिविधि पर नजर रखता है। यह हमारी पसंद-नापसंद को समझकर हमें उसी तरह की चीजें दिखाता है, जिससे हम बार-बार उसमें उलझ जाते हैं। इससे समय का सही इस्तेमाल नहीं हो पाता और निजता पर भी खतरा बनता है। 

मान लीजिए, आप पढ़ाई करते हुए नोट्स ढूंढने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी दौरान आपकी स्क्रीन पर एक मजेदार वीडियो आ जाता है। आप एक वीडियो देखते हैं, फिर दूसरा, और इस चक्कर में पढ़ाई का समय निकल जाता है। इसी तरह अगर कोई ऑनलाइन शॉपिंग या सोशल मीडिया का शौक रखता है, तो एआई उसी से जुड़ी चीजें बार-बार दिखाता है। इससे लोग बिना सोचे-समझे समय बिताने लगते हैं और जरूरी काम टल जाते हैं। 

एआई पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता भी मुश्किल का सबब बन सकती है। एआई के सहारे हमारी छोटी-छोटी समस्याएं जल्दी हल हो जाती हैं। लेकिन जब हर काम के लिए एआई पर निर्भर हो जाते हैं, तो अपनी सोचने और फैसले लेने की आदत कमजोर पड़ने लगती है। मसलन, अगर आप हर दिन का शेड्यूल बनाने के लिए एआई का सहारा लेते हैं, तो धीरे-धीरे खुद योजना बनाने की आदत कम होने लगती है। किसी दिन अगर एआई न हो, तो आप परेशान हो सकते हैं कि क्या करें और कैसे करें। 

एआई के साथ दिक़्क़त ये भी है कि क्या सही और क्या गलत, ये कौन तय करे? जब आप एआई पर निर्भर करते हैं तो कई बार वो आपके लिए ये भी तय करने लगता है कि कौन सी चीजें हमारे लिए सही हैं। लेकिन ये सवाल उठता है कि क्या तकनीक को ये हक होना चाहिए कि वह हमारी आदतों को बदले? कभी-कभी एआई हमें बेहतर बनाने के बजाय ऐसी आदतें बढ़ा देता है, जो हमारे लिए नुकसानदायक हो सकती हैं।

टालमटोलऔरसमयप्रबंधनसुधारनेकेलिएउपाय 

  1. बड़े काम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटें। हर दिन थोड़ा-थोड़ा करने का प्रयास करें। इससे काम आसान और संभला हुआ लगेगा। 
  2. आत्म-विश्वास बढ़ाने पर ध्यान दें। असफलता के डर को दूर करने के लिए, खुद को याद दिलाएं कि हर कोशिश सीखने का मौका है। 
  3. अपने दिमाग और शरीर को तरोताजा रखने के लिए छोटे ब्रेक लें। नई गतिविधियों में रुचि लेकर काम के प्रति उत्साह बनाए रखें। 
  4. हर काम के लिए समय सीमा तय करें। अगर खुद की बनाई डेडलाइन को मानना मुश्किल हो, तो किसी दोस्त या सहकर्मी की मदद लें। 
  5. किसी काम को पूरा करने पर खुद को छोटा-सा इनाम दें। यह प्रोत्साहन के लिए बहुत कारगर हो सकता है। 
  6. समय प्रबंधन के लिए लिस्ट, ऐप्स या कैलेंडर का इस्तेमाल करें। रिमाइंडर सेट करें ताकि महत्वपूर्ण काम भूलें नहीं। 
  7. ध्यान भटकाने वाली चीजें, जैसे मोबाइल, टीवी आदि को दूर रखें। एक शांत और व्यवस्थित जगह पर काम करें। 
  8. स्वस्थ दिनचर्या, जैसे सही नींद और भोजन, काम करने की क्षमता बढ़ाती है। नियमित व्यायाम दिमाग को सक्रिय रखता है। 
  9. अगर कोई काम मुश्किल लग रहा है, तो परिवार, दोस्तों या सहकर्मियों से मदद लें। सही मार्गदर्शन से टालमटोल की समस्या कम हो सकती है। 
  10. दिन खत्म होने पर यह जांचें कि आपने कितना काम पूरा किया और क्या बेहतर किया जा सकता है। अपनी उपलब्धियों पर ध्यान दें और निरंतर सुधार के लिए प्रेरित रहें।

टालमटोलकोदूरकरनेऔरसमयप्रबंधनमेंमददकरनेवालीतकनीकें 

टू-मिनट रूल : अगर कोई काम 2 मिनट में किया जा सकता है, तो उसे तुरंत करें। ईसेनहॉवर मैट्रिक्स :  • अपने काम को चार भागों में बांटें: 1. जरूरी और तुरंत (Do now) 2. जरूरी लेकिन बाद में (Schedule) 3. गैर-जरूरी लेकिन तुरंत (Delegate) 4. गैर-जरूरी और गैर-महत्वपूर्ण (Delete) 90/30 का नियम : 90 मिनट तक फोकस होकर काम करें और फिर 30 मिनट का ब्रेक लें।
ईट द फ्रॉग : दिन का सबसे मुश्किल या जरूरी काम पहले करें।
पॉमोडोरो तकनीक’ अपनाएं: 25 मिनट काम करें, फिर 5 मिनट का ब्रेक लें। इसे दोहराएं। यह तकनीक एकाग्रता बढ़ाने और थकान कम करने में मदद करती है।  बैचिंग : एक जैसा काम एक साथ करें। उदाहरण: • सभी ईमेल एक बार में चेक करें। • सभी कॉल्स को एक निश्चित समय में निपटाएं।
टाइम-ब्लॉकिंग :अपने दिन को समय-खंडों (time blocks) में बांटें और हर खंड में एक विशिष्ट काम करें। उदाहरण: सुबह 9-10 बजे ईमेल, 10-12 बजे रिपोर्ट लिखना, और 1-2 बजे मीटिंग।
कैनबन बोर्ड : काम को तीन हिस्सों में बांटें: 1. करना है (To Do) 2. चल रहा है (In Progress) 3. पूरा हो चुका (Done)
SMART लक्ष्य निर्धारण: लक्ष्य को  – Specific,  – Measurable,  – Achievable,  – Relevant,  Time-bound बनाएं।मिरेकल मॉर्निंग : सुबह के पहले घंटे को अपने सबसे महत्वपूर्ण और रचनात्मक कामों के लिए इस्तेमाल करें।
पार्किंसन का नियम (Parkinson’s Law) “काम उतने समय में पूरा होता है जितना उसके लिए दिया जाता है।”  खुद को छोटी डेडलाइन दें और काम जल्दी खत्म करने की कोशिश करें।5 सेकंड का नियम : अगर आप किसी काम को टालने का सोच रहे हैं, तो तुरंत 5 से गिनती शुरू करें और बिना सोचे-समझे काम शुरू कर दें।

डिजिटल डिटॉक्स : दिन में कुछ समय के लिए फोन, सोशल मीडिया और अनावश्यक ऐप्स से दूरी बनाएं। 





एआईकोउसकीहदमेंरखिए, मतदीजिएअपनेजीवनकीचाबी 

एआई आपकी जिंदगी में ऐसे सकारात्मक बदलाव ला सकता है, जो न सिर्फ प्रोक्रास्टिनेशन को खत्म करें, बल्कि आपको मानसिक रूप से शांत और अधिक उत्पादक बनाए रखें। एआई का सही और संतुलित इस्तेमाल आपको काम टालने की आदत से दूर रख सकता है, लेकिन ये तभी संभव है जब आप उस पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय इसे एक सहायक उपकरण की तरह इस्तेमाल करें। 

प्रोक्रास्टिनेशन को हराना मुश्किल नहीं है। असली चुनौती है इसे हर दिन के अनुशासन में ढालना। आज आप एआई की मदद से अपने काम पूरे कर लेंगे, लेकिन सवाल ये है कि क्या आप इसे कल भी जारी रख पाएंगे? एआई आपकी मदद करता है, लेकिन ये मदद तभी फायदेमंद होगी जब आप इसे सोच-समझकर और एक हद में रहकर इस्तेमाल करेंगे। 

इसके लिए कुछ आसान तरीकों को अपनाना बेहतर रहेगा, जैसे:

• एआई टूल्स का इस्तेमाल करके अपने कामों की सूची बनाएं लेकिन दिन की प्राथमिकताएं ख़ुद तय करें और पहले सबसे जरूरी काम पूरा करें।

• एआई आधारित रिमाइंडर और ब्लॉकर्स का इस्तेमाल करें लेकिन गैरजरूरी चीजों में समय न गँवाए। 

• अपने हर काम के लिए समय तय करें और एआई की मदद से इसे ट्रैक करें लेकिन ये न भूलें कि एआई सिर्फ़ आपके लिए ट्रैक करेगा, काम आपको ही करना है। 

  • दिन खत्म होने पर अपने किए गए कामों का रिव्यू करें और अगले दिन की योजना बनाएं। 

अगर आप इन छोटे-छोटे कदमों को एआई की मदद से लागू करेंगे, तो न केवल आपकी उत्पादकता बढ़ेगी, बल्कि प्रोक्रास्टिनेशन भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। 

बचपनसेआदतबनानेकीजरूरत 

इस सब के बीच ज़रूरी है कि इस समस्या की जड़ तक पहुंचा जाए। ये समस्याएं और चुनौतियां बड़े होने पर साफ़ तौर पर दिखाई देती हैं, लेकिन इसकी जड़ें अक्सर बचपन में ही पड़ जाती हैं। टालमटोल की आदत बचपन से ही धीरे-धीरे विकसित होती है, जब बच्चों को उनके काम को लेकर जिम्मेदारी सिखाने और समय पर काम पूरा करने की आदत डालने पर ध्यान नहीं दिया जाता है। अक्सर बच्चों को ये सोचने दिया जाता है कि उनके पास समय की कोई सीमा नहीं है, और काम बाद में भी किया जा सकता है। अगर माता-पिता या शिक्षक उन्हें समय पर काम पूरा करने की अहमियत नहीं सिखाते, तो ये आदत धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है। इस आदत के चलते बच्चे न सिर्फ़ अपने स्कूल में, बल्कि भविष्य में अपने पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन में भी टालमटोल करने लगते हैं। 

एम्स के मनोवैज्ञानिकों की रिसर्च के अनुसार, समय प्रबंधन को बचपन से ही गंभीरता से नहीं लिया जाता, जिससे जीवन में अनुशासन और उत्पादकता पर असर पड़ता है। अक्सर देखा गया है कि बच्चे बिना योजना के अपना दिन बिताते हैं, जिससे अनुशासन और समय के प्रबंधन की आदत नहीं बन पाती। रिसर्च कहती है कि स्कूल हो या घर बच्चों को ज़िम्मेदारी नहीं दी जाती है। उन्हें घर के काम तो छोड़ो ख़ुद अपने काम भी नहीं करने दिये जाते हैं। एम्स के मनोवैज्ञानिकों ने सुझाया कि बचपन से समय प्रबंधन की आदत डालने के लिए स्कूलों और परिवारों को साथ आना होगा। स्कूलों में समय प्रबंधन पर आधारित गतिविधियां और वर्कशॉप शामिल की जाएं। परिवार में माता-पिता बच्चों को समय का महत्व समझाएं और खुद इसका उदाहरण पेश करें। 

इसके अलावा इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलुरु के वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत में पारिवारिक और सामाजिक दबाव के कारण युवा अक्सर खुद के लिए महत्वपूर्ण कामों को टाल देते हैं और दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करने में लग जाते हैं। ये टालमटोल को बढ़ावा देता है। 

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MIT के एक रिसर्च में पाया गया कि टालमटोल का सीधा संबंध हमारे दिमाग के ‘इंस्टैंट ग्रैटिफिकेशन’ से है। हम तुरंत खुशी देने वाली चीजें जैसे सोशल मीडिया या मूवी को प्राथमिकता देते हैं और मुश्किल या उबाऊ काम टालते रहते हैं। 

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी ने सुझाव दिया कि टालमटोल का कारण दिमाग की ‘लिम्बिक सिस्टम’ और ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’ के बीच का संघर्ष है। जहां लिम्बिक सिस्टम तुरंत आराम या खुशी चाहता है, वहीं प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स लॉन्ग-टर्म प्लानिंग के लिए जिम्मेदार है। जब लिम्बिक सिस्टम हावी हो जाता है, तो लोग काम टालने लगते हैं। 

हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की रिसर्च ने यह खुलासा किया कि टालमटोल की वजह से लोग ‘डिसीजन पैरालिसिस’ में फंस जाते हैं। ये तब होता है जब बहुत सारे विकल्प होने के कारण लोग ये तय ही नहीं कर पाते कि काम कैसे और कब शुरू करना है। 

यूनिवर्सिटी ऑफ कलिफोर्निया, लॉस एंजेलेस की रिसर्च में ये बात सामने आई कि टालमटोल का एक बड़ा कारण ‘फियर ऑफ फेल्योर’ है। जब लोग सोचते हैं कि काम में सफलता नहीं मिलेगी, तो वे इसे शुरू ही नहीं करते। खासकर परफेक्शनिस्ट लोगों में ये समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। 

कनाडा में यॉर्क यूनिवर्सिटी की रिसर्च में बताया गया कि टालमटोल और मानसिक स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध है। जिन लोगों में डिप्रेशन, स्ट्रेस या एंग्जायटी होती है, वे महत्वपूर्ण कामों को टालते रहते हैं। यह ‘भावनात्मक बचाव’ (emotional coping) का एक तरीका हो सकता है। 

प्रोकास्टिनेशन की आदत से छुटकारा पाने के लिए खुद से एक संकल्प करें: 

“आज से हर काम समय पर करेंगे। टालमटोल को अपने जीवन से हमेशा के लिए निकाल फेंकेंगे।” 

याद रखें, “आज का काम कल पर मत छोड़ें, क्योंकि कल फिर नए काम इंतजार कर रहे होंगे।” 

आपका भविष्य आपके हाथ में है, बस शुरुआत आज और अभी से करें। 

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Science journalist | Anchoring & Conceptualising Science Infotainment Shows for Vigyan Prasar, Doordarshan & All India Radio | Indie Writer & Filmmaker | GOI Projects | Sci-Expert @ CIET, NCERT | 16 yr Experience