Published Articles

Technical Support for Autism in 21st century

Note : This story was published in CSIR-NISCAIR’s prestigious Hindi magazine ‘Vigyan Pragati’ in April 2024.

आवाज़सेसंवाद: ऑटिज़्मऔरतकनीकीसमर्थन” 

विश्वऑटिज़्मजागरुकतादिवसपरविशेष 

1980 की बात है। एक बच्चे को मैसूर के ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग में लाया गया। वो माता-पिता की इकलौती संतान है। 6 साल की उम्र में वो ठीक से बोल नहीं पाता था। मानसिक रोग की कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं थी। बच्चे की डिलीवरी समय से चार हफ़्ते पहले हुई थी। दो साल की उम्र में उसने बोलना शुरु किया था। लेकिन परिवार से मिली जानकारी के मुताबिक़ वो कभी भी साफ़ नहीं बोल पाता था। वो किसी के साथ घुलता मिलता नहीं था। उसे अकेले रहना अच्छा लगता था। किसी को भी अपनी चीज़ें नहीं देता था। बेवजह हाथ हिलाता रहता था। माता-पिता शुरुआत में तो इन लक्षणों को नहीं समझ पाए लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता गया, उनके लिए उसे समझना और सम्भालना मुश्किल होता गया। 

संस्थान में बच्चे के कई टेस्ट किए गए। स्पीच और लैंग्वेज के टेस्ट, ऑडियो-लॉजिकल टेस्ट, मनोवैज्ञानिक और न्यूरोलॉजिकल टेस्ट भी किए गए। टेस्ट के साथ ही बच्चे के व्यवहार पर नज़र रखी गई। उसे बोलने, चीज़ों को पहचानने, दोस्तों से बात करने, लोगों के साथ मिलने और बातें करने के लिए कहा गया। सारे टेस्ट के परिणाम और व्यवहार को लेकर हुए आँकलन में पाया गया कि बच्चे को ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर है। टेस्ट में ये भी पता चला कि बच्चे की मेमोरी और उसकी सूंघने और चखने की शक्ति काफ़ी अच्छी थी। आईक्यू लेवल 92 था जो साढ़े पाँच साल के बच्चे के लिए ठीक था। लिहाज़ा बच्चे को स्पीच थेरेपी देने का फ़ैसला किया गया। 

ये थेरेपी बच्चे की मातृभाषा में की गई। इस थेरेपी के लिए हफ़्ते में पाँच दिन का समय तय किया गया। मौखिक और सांकेतिक भाषा में बच्चे के साथ लगातार बातचीत की गई। उसे चीज़ों को पहचानने के लिए कहा गया। अलग-अलग समूहों में बच्चे को रखा गया। उसे उसके मन के हिसाब से काम करने दिया गया। समय के साथ बच्चे के व्यवहार में बदलाव महसूस किया गया। वो बच्चों के साथ घुलने-मिलने लगा। सवाल पूछने लगा। ठीक से बात करने लगा। संगीत में रुचि लेने लगा। गेम्स खेलने लगा। लगभग नौ महीने की थेरेपी के बाद आख़िरकार उसे स्कूल में एडमिशन भी मिला। वहाँ वो दूसरे बच्चों के साथ धीरे-धीरे अच्छा व्यवहार करने लगा। 

ये केस रिपोर्ट NIMHANS जर्नल में 1989 में छपा था। ये वो दौर था जब तकनीकें उस तरह विकसित नहीं हुई थीं जैसी आज हैं। तब से अब तक भारत में ऑटिज़्म के मामलों की संख्या बढ़ी है। इन लोगों के जीवन में सुधार लाने में तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। तकनीकी प्रगति ने नई संभावनाओं के दरवाज़े खोल दिए हैं। इसने न केवल डायग्नोसिस और थेरेपी के तरीकों को बेहतर बनाया है बल्कि ऑटिज़्म से पीड़ित व्यक्तियों और उनके परिवारों को संसाधन भी उपलब्ध कराए हैं। 

भारत में, तकनीक की मदद से अलग-अलग तरीक़े इजात किए जा रहे हैं जो ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों के लिए संचार को आसान बनाते हैं। स्पीच जेनरेटिंग डिवाइसेज और पिक्टोग्राम आधारित ऐप्स इसके कुछ उदाहरण हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां ऑटिज़्म से जुड़ी संचार तकनीकों में हुई प्रगति ने ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर से पीड़ित व्यक्तियों के जीवन को बदल दिया है। ये तकनीकें न केवल उन्हें अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने में सक्षम बनाती हैं, बल्कि उन्हें सामाजिक रूप से सक्रिय और स्वतंत्र बनने में भी मदद करती हैं। इन तकनीकों के बारे में जानें उससे पहले समझ लेते हैं कि आख़िर ऑटिज़्म क्या होता है? इसके लक्षण क्या हैं? ये स्थिति कैसे पैदा होती है? और इस स्थिति को अनुकूल बनाने में इक्कीसवीं सदी में विकसित तकनीक की क्या भूमिका है। 

ऑटिज़्मक्याहोताहै

ऑटिज़्म कोई बीमारी नहीं, एक अवस्था है। ये स्थिति बचपन में ही पैदा होने लगती है और बड़े होने तक बनी रहती है। बहुत बार तो इसका आँकलन करना मुश्किल होता है। बहुत समय बीतने के बाद माता-पिता को बच्चे की इस स्थिति का अंदाज़ा मिल पाता है। इसे मेडिकल भाषा में ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर कहते हैं। ये एक विकास सम्बन्धी दिक़्क़त है जिससे पीड़ित व्यक्ति को बातचीत करने में, पढ़ने-लिखने में और समाज में मेलजोल बनाने में परेशानियां आती हैं। पीड़ित व्यक्ति का दिमाग अन्य लोगों के दिमाग की तुलना में अलग तरीके से काम करता है। कमाल की बात ये है कि ऑटिज़म से पीड़ित लोग भी एक-दूसरे से अलग होते हैं। यानि कि ऑटिज्‍म के अलग-अलग पीड़ितों के लक्षण भी एक दूसरे से अलग होते हैं। 

वैसे तो इस बीमारी से पीड़ित लोग नौकरी करने, परिवार और दोस्तों के साथ मेल-मिलाप करने में सक्षम होते हैं, लेकिन कई बार उन्हें इसके लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ती है। जहां कुछ ऑटिस्टिक लोगों को पढ़ने-लिखने में परेशानी होती है तो वहीं कुछ ऑटिज्‍म पीड़ित या तो पढ़ने-लिखने में बहुत तेज होते हैं या सामान्‍य होते हैं। परिवार, टीचर्स या दोस्‍तों की मदद से ये लोग नए स्किल्स सीखने में भी सक्षम होते हैं और बिना किसी सहारे के काम कर पाते हैं। कुछ शोध में ऐसा देखा गया है कि डायग्नोसिस और इंटरवेंशन ट्रीटमेंट सर्विसेज़ की मदद से ऑटिस्टिक लोगों को सामाजिक व्यवहार बेहतर होता है और नए स्किल्स सीखने में मदद मिलती है जिससे, वे अपना जीवन बेहतर तरीके से जी पाते हैं। 

ऑटिज़्मकेलक्षण 

  • बचपन से ही सामाजिक सम्पर्क बनाने और बातचीत करने में मुश्किल होती है। 
  • बच्चे आंखों से सम्पर्क बनाने से कतराते हैं। 
  • दूसरों के साथ खेलने या बातचीत करने में रुचि नहीं लेते हैं। 
  • भावनाओं को समझने या व्यक्त करने में उन्हें दिक्कत होती हैं।  
  • बच्चे देर से बोलना शुरु करते हैं या कभी-कभी बिल्कुल नहीं बोल पाते हैं। 
  • कई बार एक ही शब्द या वाक्य को बार-बार दोहराते हैं। 
  • यहां तक कि दूसरों की बातों को समझने में भी कठिनाई महसूस करते हैं। 
  • ऐसे बच्चों का व्यवहार सीमित होता है। 
  • उन्हें एक ही गतिविधि या वस्तु में रुचि आती है। 
  • दिनचर्या में बदलाव होने को लेकर ये बच्चे संवेदनशील होते हैं। 
  • कुछ मामलों में ऐसे बच्चे खुद को चोट भी पहुंचा लेते हैं। 

बच्चोंकोऑटिज़्मकैसेहोताहै

बच्चों में ऑटिज़्म होने के कारण अभी भी पूरी तरह से समझ में नहीं आए हैं, लेकिन ये माना जाता है कि जीन और पर्यावरण से जुड़े कारक ज़िम्मेदार हो सकते हैं। ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि ऑटिज़्म का कोई एक कारण नहीं है। 

  • ऑटिज़्म के लिए कई जीन जिम्मेदार हो सकते हैं। अगर परिवार में किसी को ऑटिज़्म है, तो बच्चे में इसका खतरा बढ़ जाता है। 
  • बच्चे के मस्तिष्क का विकास कम होने पर भी ऑटिज़्म का ख़तरा होता है। 
  • गर्भावस्था के दौरान कुछ जटिलताएं, जैसे कि संक्रमण या रसायनों के संपर्क में आने से, ऑटिज़्म का खतरा बढ़ सकता है। 
  • गर्भावस्था के दौरान कुछ दवाओं के सेवन से भी बच्चे में ऑटिज़्म हो सकता है। 

Box Item 

विश्वऑटिज़्मजागरुकतादिवस : समावेशकीराहपर 

हर साल 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज़्म जागरुकता दिवस मनाया जाता है। ये दिन ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से प्रभावित लोगों के प्रति जागरूकता बढ़ाने, उनकी चुनौतियों को समझने और उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने की एक कोशिश है। ये दिन इस बात पर भी रोशनी डालता है कि ऑटिज़्म से प्रभावित लोगों में प्रतिभा की कमी नहीं होती है। वे क्षमताओं के धनी होते हैं और उन्हें समाज का एक मूल्यवान हिस्सा माना जाना चाहिए। 

विश्व ऑटिज़्म दिवस की वजह से सरकार, गैर-सरकारी संगठन और लोगों को ऑटिज़्म से प्रभावित लोगों के समर्थन में पहल करने के लिए प्रेरित किया जाता है। यही कारण है कि आज ऑटिज़्म से जुड़े शोध की संख्या बढ़ी है। शिक्षा प्रणालियों में सुधार हुआ है। रोजगार के अवसर बढ़े हैं और सामुदायिक समर्थन मजबूत हुआ है। 

ऑटिज़्म के प्रति समावेशी समाज कैसे बनाएं?

जानकार मानते हैं कि सिर्फ़ एक दिन को मनाकर हम ऑटिज़्म के विकारों को समाज से दूर नहीं कर सकते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि एक समावेशी समाज का निर्माण हो। कई विशेषज्ञों से बातचीत के बाद ये समझ में आया कि इस स्थिति को और बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं। 

  • ऑटिज़्म के बारे में सही जानकारी साझा करनी चाहिए और गलत धारणाओं को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।
  • ऑटिज़्म से प्रभावित लोगों को उनकी स्थिति में ही स्वीकार करने और उनका सम्मान करने से स्थितियाँ बेहतर हो सकती हैं। 
  • शिक्षकों को ऑटिज़्म के बारे में ट्रेनिंग देना ज़रूरी है। 
  • ऑटिज़्म से प्रभावित लोगों की प्रतिभा और क्षमता को पहचान कर उन्हें रोजगार के समान अवसर देने चाहिए। 
  • ऑटिज़्म से प्रभावित लोगों और उनके परिवारों को सामुदायिक स्तर पर सहायता मिलनी चाहिए।

तकनीकऔरऑटिज़्मकारिश्ताकैसाहै

तकनीक की अच्छी बात ये है कि वो इंसानों की तरह किसी के बारे में राय क़ायम नहीं करता है। जो भी उसकी मदद माँगता है वो निष्पक्ष होकर उस व्यक्ति की मदद करता है। शायद इसलिए ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे और बड़े, सभी कम्प्यूटर, गेम्स, आदि के साथ जुड़ाव महसूस करते हैं। जानकार मानते हैं कि ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों को कंप्यूटर के साथ बातचीत करना अच्छा लगता है। ये बातचीत उन्हें एक सुरक्षित और भरोसेमंद वातावरण का एहसास कराती है। इस विषय पर देश-विदेश में तरह-तरह के शोध किए गए हैं। ऐसे 94 अध्ययनों की समीक्षा की गई, जिससे पता चलता है कि कैसे शैक्षिक संदर्भों में प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल ऑटिज़्म  स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर वाले लोगों को कौशल विकसित करने में मदद करता है। इतना ही नहीं खेल की मदद से किसी भी विषय का कौशल सीखने की प्रक्रिया को आसान बनाया जा रहा है। 

दिल्ली में एम्स के बाल रोग विभाग में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस एंड एडवांस्ड रिसर्च फॉर चाइल्डहुड न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसऑर्डर और चाइल्ड न्यूरोलॉजी डिवीजन में फ़ैकल्टी इंचार्ज प्रोफेसर शेफाली गुलाटी बताती हैं कि “मेरे पच्चीस साल के अनुभव में तकनीक के विकास और इसके ऑटिज़्म में इस्तेमाल को मैंने नज़दीक से देखा है। एम्स ने ऐप बनाया है जिसका नाम है PedNeuroAiims diagnostics. इस ऐप की मदद से ऑटिज़्म को डायगनोज़ किया जा सकता है। ये डॉक्टर्स के लिए है। हम पेरेंट्स और प्रोफेशनल्स को समर्थ बनाने के लिए भी तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। एक वेबसाइट भी है PedNeuroAiims.org. यहाँ पेरेंट्स और प्रोफेशनल्स की मदद के लिए ढेर सारी जानकारी है। इसके अलावा हमारे पास 24×7 हेल्पलाइन है जो 2018 से सक्रिय है यानी कोविड के दौर से भी बहुत पहले से चल रही है। हम कोशिश कर रहे हैं कि एक डेटाबेस तैयार किया जाए जिसमें ऑटिज़म से जुड़े लोगों की जानकारी हो।” 

“ऑटिज़्म के निदान के लिए भी हम तकनीक की मदद ले रहे हैं। इससे आनुवांशिक समस्याओं का पता लगाने में मदद मिलती है। आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर वर्चुअल रियेलिटी, ऑगमेंटेड रियेलिटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भी ऐप बनाने पर काम चल रहा है। फिलहाल ये सॉफ़्टवेयर आईपैड जैसे टैबलेट पर काम कर रहे हैं। साथ में हम रोबोट वाले खिलौने भी बना रहे हैं। इसकी मदद से एक ऑटिज़्म पीड़ित बच्चा जिसे संचार की दिक़्क़त होती है, वो रोबोट्स के साथ बात करना चाहता है। हम इस बातचीत को स्टडी करते हैं जिससे हमें ये समझ में आता है कि बच्चों का सामाजिक परिवेश बेहतर कैसे हो सकता है। हम तकनीक को इलाज में इस्तेमाल करके बच्चों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं। इस तरह अलग-अलग पहलुओं पर रिसर्च चल रही है और तकनीक इसमें बहुत बड़ा रोल निभा रही है।” 

ऑटिज्म के क्षेत्र में काम करने वाली 25 साल पुरानी संस्था एक्शन फॉर ऑटिज्म की संस्थापक, मेरी बरुआ ऑटिज्म के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग को लेकर बहुत सकारात्मक है। “जब कोई व्यक्ति बोल नहीं पाता है तो हम मान लेते हैं कि उसे कुछ भी समझ में नहीं आता है। उनके पास साझा करने के लिए कुछ भी नहीं है। लेकिन जब आप उन्हें एक संचार उपकरण देते हैं, तब आपको एहसास होता है कि जो व्यक्ति बिल्कुल नहीं बोल रहा था, उसके पास विचारों और भावनाओं की एक पूरी दुनिया है जिसे वो व्यक्त करने में सक्षम है। यही कारण है कि संचार के लिए प्रौद्योगिकी बहुत महत्वपूर्ण है।” 

साथ ही वो हमारे लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग भी गिनाती हैं। “सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र जहां प्रौद्योगिकी लोगों के लिए उपयोगी है वो है संचार। ऑटिज्म से पीड़ित लोग संचार के लिए वैकल्पिक साधनों का इस्तेमाल कर सकते हैं। आज ऑटिज़्म पीड़ित लोगों के लिए अद्भुत संचार उपकरण मौजूद हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जो संवाद नहीं कर सकते इसलिए वे चीजों को टाइप करने और संवाद करने के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर रहे हैं। टेक्स्ट टू स्पीच सॉफ्टवेयर हैं जो बहुत उपयोगी है। बहुत से ऑटिज़्म से पीड़ित लोग ध्वनि से परेशान होते हैं, इसलिए वे शोर को कम या ख़त्म करने वाले ईयरफ़ोन का उपयोग करते हैं।” 

शैक्षिकतकनीकमेंविकास 

बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है, शिक्षा उसके जीवन की एक महत्वपूर्ण ज़रूरत बन जाती है। ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर से पीड़ित बच्चों को पढ़ाई में बहुत सारी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है। लिहाज़ा शिक्षा एक बड़ा क्षेत्र है जहाँ तकनीकी प्रगति ने ज़रूरी योगदान दिया है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, इंटरैक्टिव ऐप्स और गेम-आधारित लर्निंग टूल्स ने ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों के लिए शिक्षा को और सुलभ और आकर्षक बनाया है। ये तकनीकें विशेष रूप से ऐसे बच्चों के लिए डिज़ाइन की गई हैं जिन्हें ट्रेडिशनल लर्निंग एनवायरनमेंट में सीखने में कठिनाई होती है। 

सरकारी योजनाओं से जुड़ी मनोविकास चैरिटेबल सोसायटी के प्रबंध सचिव डॉ. आलोक कुमार भुवन बताते हैं कि ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे तस्वीरों की मदद से ज़्यादा जल्दी, आसानी से और अच्छी तरह सीखते हैं। कम से कम शब्दों में हम तस्वीरों की मदद से अपनी बात कह सकते हैं। सरकार की जो पॉलिसी है, सरकारी वेबसाइट है अगर वो तस्वीरों की मदद से बनाई जाए तो ऑटिज़्म पीड़ित व्यक्ति खुद उसे देख और समझ सकता है। इसे करने के लिए एआई का इस्तेमाल करते हैं तो पूरी प्रक्रिया को आसान बनाया जा सकता है। ऐप की मदद से रास्तों के बारे में आसानी से बताया जा सकता है। अगर कोई व्यक्ति कम्प्यूटर पर काम कर रहा है, तो टेक्स्ट टू स्पीच जैसी सुविधाएँ दी जा सकती हैं जिससे काम करना आसान हो सके। तो जागरुकता के साथ ही अगर सुविधा भी मिल जाए तो ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे भी जीवन में आगे बढ़ सकते हैं।” 

उदाहरण 1: ओट्सिमो 

ये एक शैक्षिक ऐप है जो ऑटिज़्म और विकास से जुड़े दूसरे विकार वाले बच्चों के लिए डिज़ाइन की गई है। ये गेम-आधारित लर्निंग और इंटरैक्टिव एजुकेशनल गेम्स के माध्यम से बेसिक कॉन्सेप्ट्स, भाषा स्किल्स, और मोटर स्किल्स सिखाता है। एक अध्ययन में, ओट्सिमो का इस्तेमाल करने वाले ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों ने भाषा सीखने और संज्ञानात्मक कौशल में काफ़ी सुधार दिखाया। इससे पता चलता है कि इंटरैक्टिव और गेम-आधारित शैक्षिक तकनीकें ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर से पीड़ित बच्चों के लिए उपयोगी हो सकती हैं। 

उदाहरण 2: ABCmouse.com

ये एक ऑनलाइन शैक्षिक प्रोग्राम है जो 2 से 8 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस प्लेटफ़ॉर्म पर रीडिंग, मैथ, साइंस, और आर्ट जैसे विषयों में तरह-तरह की गतिविधियाँ और गेम्स हैं। एक शोध के मुताबिक इस ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल करने वाले बच्चों ने पढ़ने में और गणित में अच्छी प्रगति की है। इस प्रकार के प्रोग्राम विशेष शिक्षा की जरूरत वाले बच्चों के हिसाब से भी डिज़ाइन किए जा सकते हैं, जिससे उन्हें शिक्षा से जुड़े लक्ष्यों को पाने में मदद मिलती है। 

उदाहरण 3: स्टारकार्यक्रम (ऑटिज़्मअनुसंधानपरआधारितशिक्षणकेलिएरणनीतियाँ

स्टार कार्यक्रम की मदद से बच्चों ने अकादमिक और सामाजिक कौशल में सुधार किया है। इस प्रोग्राम ने शिक्षकों और थेरेपिस्ट को भी ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रभावी उपकरण दिए हैं। ये एक शैक्षिक प्रोग्राम है जो ऑटिज़्म रिसर्च पर आधारित शिक्षण रणनीतियों को लागू करता है। ये लर्निंग मॉड्यूल्स और इंटरैक्टिव गतिविधियों के माध्यम से व्यवहारिक, संज्ञानात्मक और भाषा सम्बन्धित कौशल सिखाता है। 

डॉ भुवन मानते हैं कि “पाँच साल पहले तक ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे हायर एजुकेशन में जाते थे। लेकिन अब लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ रही है कि बच्चे आगे पढ़ सकते हैं। तो वो अब कॉलेज जा रहे हैं, यूनिवर्सिटीज जा रहे हैं, स्किल ट्रेनिंग ले रहे हैं और यूजीसी भी इसके प्रति जागरूक हुई है। यूजीसी ने सभी प्रकार की डिसेबिलिटीज को लेकर एक अलग गाइडलाइन निकाली है कि कैसे ये बच्चे या ये स्टूडेंट्स कॉलेज में पढ़ सकते हैं, कैसे उनकी पढ़ाई से जुड़ी जरूरतों को पूरा किया जाए। इसी तरह हायर एजुकेशन में भी बहुत सारे बदलाव किए गए हैं। बच्चे को उसकी पसंद के हिसाब से विषय चुनने की छूट दी जाती है। इतना ही नहीं गाइडलाइन्स की मदद से बच्चों को कई सुविधाएँ भी दी गई हैं। जैसे किसी बच्चे को अगर लिखने में प्रॉब्लम है तो वो अपनी परीक्षा कंप्यूटर पर दे सकता है। या फिर उसके लिए अलग तरह के सवाल बनाए जा सकते हैं। अगर बच्चों के लिए कोई सवाल ऐसा है कि वो बच्चा पढ़ नहीं सकता या समझ नहीं सकता है तो उनके लिए पिक्टोरियल सवाल बनाए जा सकते हैं। इससे उन्हें परीक्षा पास करने में आसानी होगी। 

संचारतकनीकसेजुड़ीप्रौद्योगिकी 

ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों के लिए संचार एक बड़ी चुनौती होती है। इस चुनौती का समाधान खोजने के लिए, तरह-तरह की तकनीकों और उपकरणों का विकास किया गया है जो संचार को सरल बनाने में मदद करते हैं। ये तकनीकें न बोल पाने वाले लोगों को अपने विचार और भावनाएँ व्यक्त करने में सहायता करती हैं और उन्हें सम्मान के साथ समाज में भाग लेने का अवसर देती हैं। 

1. स्पीचजेनरेटिंगडिवाइसेज – Proloquo2Go 

Proloquo2Go एक ऐप आधारित डिवाइस है जो आईपैड और आईफोन को पूरी तरह विकसित स्पीच जेनरेटिंग डिवाइस में बदल देता है। इसमें सिंबल आधारित और टेक्स्ट टू स्पीच के विकल्प शामिल हैं, जो इस्तेमाल करने वाले को तस्वीरों और प्रतीकों की मदद से संचार करने की क्षमता देता है। एक अध्ययन में देखा गया कि इस डिवाइस का इस्तेमाल करने वाले ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर से पीड़ित बच्चों ने अपने संचार कौशल में बेहतरीन सुधार दिखाया। 

2. विजुअलसपोर्टऔरएडेप्टिवसाइनलैंग्वेज 

PECS (Picture Exchange Communication System) 

ये एक चित्र-आधारित संचार प्रणाली है जिसका मक़सद शुरुआती चरण में संचार कौशल विकसित करना है। इसमें, चित्रों की मदद से अपनी इच्छाओं और ज़रूरतों को व्यक्त किया जा सकता है। इस प्रणाली का उपयोग करने वाले बच्चों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि इससे उनकी संचार क्षमता में सुधार हुआ और सामाजिक व्यवहार में सकारात्मक बदलाव आया। 

3. ऑगमेंटेडऔरवर्चुअलरियलिटी (AR/VR)

वर्चुअल रियलिटी सोशल स्टोरीज 

वर्चुअल रियलिटी आधारित सोशल स्टोरीज ऑटिज़्म से पीड़ित व्यक्तियों को सामाजिक स्थितियों और इंटरैक्शन्स को समझने और उनमें सहज होने में मदद करती हैं। ये स्टोरीज उन्हें सामान्य जीवन में लोगों के साथ घुलने-मिलने के लिए तैयार करती हैं। VR आधारित थेरेपी से गुजरने वाले ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर से पीड़ित बच्चों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि उनकी सामाजिक समझ और संवाद कौशल में ज़रूरी सुधार हुआ। 

Box Item 

जालंधर में डॉ. बी आर अम्बेडकर राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार इंजीनियरिंग विभाग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केंद्र के प्रमुख प्रोफेसर अरुण खोसला ने कुछ ऐप्स के नाम सुझाएं हैं जो ऑटिज़्म से प्रभावित लोगों के जीवन को आसान बनाने में मदद कर रहे हैं। 

ऑटिज़्मआईहेल्पसाउंड : ये ऐप ध्वनि पहचानने और समझने में मदद करता है। इससे भाषा के विकास और सामाजिक एकीकरण में मदद मिल सकती है।

एबीएफ्लैशकार्डऔरगेम्सइमोशन्स : ये ऐप अप्लाइड बिहेवियर एनालिसिस (एबीए) तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए ऑटिज़्म से प्रभावित लोगों की भावनाओं को समझने और संवेदनशीलता के विकास में मदद करने के लिए फ्लैश कार्ड और इंटरैक्टिव गेम्स का इस्तेमाल करता है। 

चॉइसवर्क्स : ये विज़ुअल सपोर्ट ऐप ऑटिज़्म से प्रभावित लोगों को उनके दैनिक जीवन को समझने और व्यवस्थित करने में मदद करता है, जैसे कि पिक्टोरियल शेड्यूल, टाइमर, और चॉइस बोर्ड का उपयोग करके। 

सोशलस्टोरीज़क्रिएटरएंडलाइब्रेरी: ये ऐप ऑटिज़्म से प्रभावित लोगों को सामाजिक स्थितियों और व्यवहारों को समझने में मदद करने के लिए सामाजिक कहानियों का इस्तेमाल करता है। 

ब्रेनपरेडसी.टच.लर्न : ये ऐप चित्रों और इंटरैक्टिव पाठों के माध्यम से भाषा, गणित, और सामाजिक कौशल के विकास में मदद करता है। 

ऑटिज़्मट्रैकरप्रो : ये ऐप माता-पिता और देखभाल करने वालों को अपने बच्चे के व्यवहार को ट्रैक करने और उनका विश्लेषण करने में मदद करता है, जैसे कि मूड, नींद, और आहार के पैटर्न और रुझानों की पहचान। 

ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी और बौद्धिक विकलांगता वाले लोगों के लिए एक चिकित्सीय केंद्र, SOREM की कार्यकारी निदेशक और प्रिंसिपल संगीता जैन ने ऑटिज़्म पीड़ित बच्चों के साथ लम्बा समय बिताया है। वो बताती हैं कि वो बच्चों के लिए आवाज़ नाम की ऐप का इस्तेमाल करती हैं। उन्होंने ख़ुद इस ऐप को इस्तेमाल करना सीखा और फिर बच्चों को भी समय के साथ ट्रेन किया। 

NIMHANS में बाल और किशोरावस्था मनोचिकित्सा विभाग में प्रोफेसर और प्रमुख डॉ. के जॉन विजय सागर मानते हैं कि “इक्कीसवीं सदी में इनोवेटर्स थेरेपी के लिए एक से एक ऐप लाने की कोशिश कर रहे हैं जैसे एडवांस इन टेक्नोलॉजी वर्चुअल रियलिटी आधारित ऐप है जिसकी मदद से लोग वर्चुअल थेरेपी ले सकते हैं। ये एक वर्चुअल थेरेपिस्ट होगा जो सीधे व्यक्ति या परिवार के सदस्यों से ऑनलाइन बातचीत करेगा। ये एक बहुत ही इंटरैक्टिव प्रक्रिया होगी और क्योंकि इसमें वीआर जोड़ा गया है, ये ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्ति के लिए भी एक बहुत ही गहन अनुभव होगा।” 

तकनीकीविकासकेपीछेछिपेसिद्धांत 

किसी भी तकनीक को विकसित करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी होता है। ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से प्रभावित लोगों की ज़रूरतों और प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिए तैयार की गई प्रौद्योगिकी को कुछ सिद्धांतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाना चाहिए। प्रोफेसर अरुण खोसला ने इन सिद्धांतों के बारे में जानकारी दी। 

  1. यूज़र सेंटर्ड डिज़ाइन (उपयोगकर्ता-केंद्रित डिज़ाइन) – इसमें उपयोगकर्ता की आवश्यकताओं, प्राथमिकताओं और प्रतिक्रिया को ध्यान में रखा जाता है।
  2. कस्टमाइज़ेशन एंड पर्सनलाइज़ेशन (अनुकूलन और वैयक्तिकरण) – इसमें उपयोगकर्ता की व्यक्तिगत सेटिंग्स को ध्यान में रखा जाता है। 
  3. विज़ुअल सपोर्ट एंड सिम्बल बेस्ड कम्यूनिकेशन (दृश्य समर्थन और प्रतीक-आधारित संचार) – ये दृश्य संवेदनशीलता को बढ़ाता है। 
  4. सेंसरी इंटीग्रेशन एंड रेगुलेशन (संवेदी एकीकरण और विनियमन) – ये उपयोगकर्ता की संवेदी एकीकरण की ज़रूरत को समझता है। 
  5. फोरकास्ट एंड स्ट्रक्चर (पूर्वानुमान और संरचना) – ये तकनीकी वातावरण और इंटरैक्शन को आदर्श बनाता है। 
  6. सोशल एंगेजमेंट एंड कम्यूनिकेशन (सामाजिक जुड़ाव और संचार) – ये सामाजिक संपर्क और संचार का समर्थन करता है। 

इन सिद्धांतों के आधार पर, प्रौद्योगिकी समाधान इस्तेमाल करने वाले के लिए एक सुरक्षित, सहायक और समावेशी वातावरण बनाता है। 

हालाँकि डॉ के जॉन विजय सागर हमारा ध्यान इस बात की तरफ़ भी खींचना चाहते हैं कि “तकनीक का इस्तेमाल विवेकपूर्ण तरीक़े से करना ज़रूरी है। उनका मानना है कि तकनीकी प्रगति को इस्तेमाल करना सही है लेकिन उन्हें औपचारिक मूल्यांकन के प्रतिस्थापन के रूप में नहीं मान सकते हैं। बाल रोग विशेषज्ञ, बाल मनोचिकित्सक, बाल चिकित्सा न्यूरोलॉजिस्ट, मनोवैज्ञानिक, भाषण रोग विज्ञानी मिलकर एक टीम बनाएं, बच्चों का औपचारिक नैदानिक ​​मूल्यांकन करें और फिर चिकित्सा को लेकर जानकारी दें। माता-पिता को भी लगातार कोशिश करनी होगी। तकनीक बच्चों और उनके माता-पिता या डॉक्टर की मदद के लिए है, उन्हें सहायक उपकरण के तौर पर ही देखना चाहिए।”  

सेंसरीऔरमोटरस्किल्सकाविकास

ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) से पीड़ित व्यक्तियों के लिए, सेंसरी इंटीग्रेशन और मोटर स्किल्स का विकास बहुत ज़रूरी होता है। इनसे जुड़ी नई तकनीकें विकसित की गई हैं। विशेष सेंसरी खिलौने, वियरेबल डिवाइसेज और वर्चुअल रियलिटी अनुभव इस क्षेत्र में नवाचार के उदाहरण हैं। तकनीकी प्रगति ने थेरेपिस्ट और शिक्षक को नए उपकरण और तरीके दिए हैं जो बच्चों के कौशल को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। ये तकनीकें व्यक्ति को अपने सेंसरी प्रोसेसिंग और मोटर स्किल्स को बेहतर बनाकर क्षमता में सुधार करने में मदद करती हैं। अध्ययन से पता चलता है कि इन तकनीकों की मदद से ऑटिज़्म से पीड़ित व्यक्तियों के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है। 

1. सेंसरीरूम्सऔरसेंसरीइंटीग्रेशनउपकरणकीमददसेसेंसरीइंटीग्रेशनथेरेपी  

एक अध्ययन में पाया गया है कि इस थेरेपी का इस्तेमाल करने वाले ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों की उत्तेजना में सुधार दिखाई दिया और उनका सामाजिक संवाद भी बेहतर हुआ। सेंसरी रूम्स विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए कमरे होते हैं जो अलग-अलग तरह के सेंसरी अनुभव देते हैं। ये अनुभव देखने, छूने, सुनने और सूंघने के माध्यम से लिए जा सकते हैं और व्यक्ति की सेंसरी प्रोसेसिंग क्षमताओं को विकसित करने में मदद करते हैं।  

2. इंटरैक्टिवफ्लोरप्रोजेक्शनकेज़रिएमोटरस्किल्सकाविकास 

इंटरैक्टिव फ्लोर प्रोजेक्शन सिस्टम में ज़मीन पर गेम्स और गतिविधियों को प्रोजेक्ट किया जाता है जो बच्चों को चलने, कूदने और दूसरे मोटर कौशल को सुधारने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इंटरैक्टिव फ्लोर प्रोजेक्शन का इस्तेमाल करने वाले बच्चों पर किए गए एक अध्ययन ने दिखाया कि इस तरह की गतिविधियों ने उनके मोटर स्किल्स और फिजिकल एक्टिविटी के स्तर में सुधार किया। 

3. वर्चुअलरियलिटी (VR) आधारितथेरेपीऔरमोटरस्किल्सट्रेनिंग 

वर्चुअल रियलिटी तकनीक का उपयोग करते हुए, थेरेपिस्ट ऐसे वर्चुअल एनवायरनमेंट तैयार कर सकते हैं जो मोटर कौशल, जैसे कि संतुलन और समन्वय, के विकास को लक्षित करते हैं। VR आधारित मोटर स्किल्स ट्रेनिंग प्रोग्राम का इस्तेमाल करने वाले ऑटिज़्म से पीड़ित व्यक्तियों पर एक अध्ययन किया गया। इसमें  दिखाया गया कि ये उनके मोटर स्किल्स और संतुलन में महत्वपूर्ण सुधार ला सकता है। 

संगीता जैन इस बात पर भी ज़ोर डालती हैं कि “तकनीक विकसित होने से बात नहीं बनती है बल्कि तकनीक को अच्छी तरह इस्तेमाल करना भी आना चाहिए। इसके लिए शिक्षकों को, माता-पिता को, बच्चों को ठीक से ट्रेनिंग दी जानी चाहिए जिससे वो तकनीक की भरपूर मदद ले सकें। साथ ही बच्चों के समग्र विकास के लिए ज़रूरी है कि उसे अपना कम्यूनिकेशन डिवाइस हमेशा मिले। ऐसा न हो कि वो डिवाइस उसे कभी-कभी मिल रहा है। जैसे हमारी आवाज़ चौबीस घंटे हमारे साथ रहती है बिल्कुल वैसे ही ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों का कम्यूनिकेशन डिवाइस हर वक्त उनके साथ रहना चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि बच्चे के शिक्षक और उसके माता-पिता को भी वो डिवाइस इस्तेमाल करना आना चाहिए।” 

“साथ ही बच्चों को सोशल स्किल्स सिखाने के लिए उन्हें बाहर लेकर जाना ज़रूरी है। जैसे बाल कटवाने के लिए लेकर जाएँ। उन्हें रियल दुनिया में रखें, तस्वीरों के माध्यम से वो अच्छी तरह सीखते हैं। कार्टून कैरेक्टर की मदद लेकर सोशल स्किल्स सिखाया जा सकते हैं। इसके अलावा तकनीक के निजीकरण की भी ज़रूरत है। हर बच्चे के लिए उसकी ज़रूरत के हिसाब से ऐप को हर बच्चे के अनुकूल बनाना आना चाहिए। | हर बच्चा एक अलग केस स्टडी है औेर उस पर बिल्कुल अलग तरह से ध्यान देने की ज़रूरत है।” 

अच्छी बात ये है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से लोग अब ऑटिज़्म के बारे में आसानी से जानकारी पा सकते हैं, इसकी विविधता और जटिलता को समझ सकते हैं। ऑनलाइन फोरम्स, सोशल मीडिया ग्रुप्स, और वेब-आधारित संसाधनों ने ऑटिज़्म से पीड़ित व्यक्तियों और उनके परिवारों के लिए एक मजबूत समर्थन नेटवर्क बनाया है। डिजिटल स्क्रीनिंग टूल और निगरानी प्रणालियां ऑटिज़्म की पहचान और इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अनुसंधान और नवाचार प्रौद्योगिकियों ने ऑटिज़्म के अध्ययन को आगे बढ़ाया है। 

भविष्य में, ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से प्रभावित लोगों के लिए उनके अनुकूल तकनीकें विकसित करने पर ज़ोर दिया जा रहा है। हालाँकि तकनीकी प्रगति के बावजूद, चुनौतियाँ अब भी मौजूद हैं। इनमें संसाधन की उपलब्धता, प्रशिक्षण और जागरूकता, और तकनीकी समाधानों को जीवन में शामिल करने का सामर्थ्य शामिल है। भविष्य में, इन चुनौतियों का समाधान करते हुए, ज़्यादा समावेशी और अनुकूलित तकनीकी समाधान पर काम करना होगा। उम्मीद की जा रही है कि इन तकनीकों का लगातार विकास ऑटिज़्म से पीड़ित व्यक्तियों को भविष्य में नई ऊँचाइयाँ छूने के काबिल बनाएगा। 

Unknown's avatar

Science journalist | Anchoring & Conceptualising Science Infotainment Shows for Vigyan Prasar, Doordarshan & All India Radio | Indie Writer & Filmmaker | GOI Projects | Sci-Expert @ CIET, NCERT | 16 yr Experience